नई दिल्ली । ईरान एक बार फिर सुलग (Fire in Iran) रहा है। जनवरी 2026 की कड़कड़ाती ठंड (bitter cold) में तेहरान से लेकर मशहद तक सड़कों पर जो नारे गूंज रहे हैं, उनमें एक नाम बार-बार आ रहा है- रजा पहलवी। यह उसी ‘शाह’ (Raja) के बेटे हैं जिन्हें 1979 की इस्लामी क्रांति में देश छोड़कर भागना पड़ा था।
प्रदर्शनकारी अयातुल्ला खामेनेई के शासन से तंग आ चुके हैं और ‘शाह’ की वापसी चाहते हैं। सुनने में यह लोकतंत्र की जीत जैसा लग सकता है, लेकिन अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें, तो भारत के लिए यह जश्न मनाने का नहीं, बल्कि सावधान होने का समय हो सकता है।
क्यों? क्योंकि इतिहास गवाह है कि ईरान का ‘शाह’ परिवार पाकिस्तान का ‘सगा यार’ था, जबकि कट्टरपंथी अयातुल्ला शासन अनचाहे में ही सही, भारत के लिए रणनीतिक तौर पर मददगार साबित हुआ।
1965 और 1971 की जंग: जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, तो ईरान ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया। खबरों और दस्तावेजों के मुताबिक, शाह ने पाकिस्तान को ईंधन मुफ्त दिया और अपने लड़ाकू विमानों (F-86 Sabres) को पाकिस्तान की मदद के लिए भेजा।
विमानों को पनाह: जब भारतीय वायुसेना (IAF) पाकिस्तान पर भारी पड़ रही थी, तो पाकिस्तानी विमानों ने ईरान के हवाई अड्डों पर शरण ली थी ताकि वे भारतीय बमबारी से बच सकें।
डिप्लोमेटिक वार: शाह ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को ‘आक्रमणकारी’ तक कहा था।
दरअसल उस दौर में ईरान के शाह अमेरिका के सहयोगी थे, जबकि भारत का झुकाव सोवियत संघ की तरफ था। पाकिस्तान और ईरान दोनों CENTO (Central Treaty Organization) का हिस्सा थे, जो एक अमेरिकी सुरक्षा गठबंधन था। इसलिए, शाह का ईरान भारत के लिए एक तरह से ‘दुश्मन का दोस्त’ था।
अयातुल्ला का दौर: कट्टरपंथी, फिर भी भारत के लिए ‘वरदान’?
1979 में इस्लामी क्रांति हुई। अयातुल्ला खामेनेई सत्ता में आए। दुनिया को लगा कि एक कट्टर शिया देश भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश के लिए मुसीबत बनेगा। लेकिन जिओ-पॉलिटिक्स यानी भू-राजनीति ने बाजी पलट दी।
अयातुल्ला के आने से भारत को तीन बड़े फायदे हुए:
पाकिस्तान से दूरी: अयातुल्ला ने अमेरिका को ‘शैतान’ घोषित कर दिया। चूंकि पाकिस्तान अमेरिका का करीबी था, इसलिए ईरान और पाकिस्तान के बीच दूरी आ गई।
शिया-सुन्नी विवाद: पाकिस्तान सुन्नी-बहुल देश है और वहां सऊदी अरब का प्रभाव बढ़ा। ईरान (शिया देश) और सऊदी अरब की दुश्मनी ने पाकिस्तान को ईरान से दूर कर दिया। इसने ईरान को भारत के करीब धकेल दिया।
तालिबान का दुश्मन: 1990 के दशक में जब पाकिस्तान समर्थित तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया, तो भारत और ईरान ने मिलकर ‘नॉर्दर्न अलायंस’ (अहमद शाह मसूद) की मदद की। यह भारत-ईरान दोस्ती का सबसे सुनहरा दौर था।
संक्षेप में, अयातुल्ला का ईरान दुनिया के लिए ‘विलेन’ था, इसलिए उसे दोस्तों की जरूरत थी, और भारत ने उस मौके का फायदा उठाया (जैसे- चाबहार पोर्ट)।
अगर बेटा (रजा पहलवी) वापस आया तो क्या होगा?
ताजा हालात इशारा कर रहे हैं कि अयातुल्ला शासन कमजोर पड़ रहा है। अगर रजा पहलवी सत्ता में आते हैं या ईरान में पश्चिम समर्थक सरकार बनती है, तो भारत के लिए समीकरण बदल सकते हैं।
भारत के लिए टेंशन के कारण:
अमेरिका-ईरान-पाकिस्तान धुरी की वापसी: रजा पहलवी अमेरिका में रहते हैं और पूरी तरह से पश्चिमी सोच के हैं। अगर वे सत्ता में आते हैं, तो ईरान और अमेरिका फिर दोस्त बन जाएंगे। ऐसे में पाकिस्तान, जो हमेशा अमेरिका का ‘पिठ्ठू’ बनने की कोशिश करता है, फिर से ईरान का लाडला बन सकता है।
चाबहार पोर्ट का महत्व कम होना: अभी भारत के लिए ईरान इसलिए जरूरी है क्योंकि पाकिस्तान हमें रास्ता नहीं देता। अगर ईरान-पाकिस्तान दोस्ती हो गई, तो चीन (Gwadar Port) और ईरान के बीच भी नए समीकरण बन सकते हैं, जिससे भारत का ‘चाबहार प्रोजेक्ट’ कमजोर पड़ सकता है।
कश्मीर पर रुख: अयातुल्ला शासन ने कश्मीर मुद्दे पर अक्सर दबे-छुपे ही सही, लेकिन संतुलन बनाए रखा (क्योंकि उन्हें भारत के व्यापार की जरूरत थी)। शाह का परिवार ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान के स्टैंड का समर्थक रहा है।
दोस्त वही, जो काम आए
भावनात्मक रूप से हम ईरान के लोगों की आजादी का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन कूटनीति भावनाओं से नहीं चलती। सच्चाई यह है कि एक ‘अलग-थलग’ ईरान भारत के लिए ज्यादा फायदेमंद रहा है, बजाय एक ऐसे ‘आधुनिक’ ईरान के जो अमेरिका और पाकिस्तान की गोद में जाकर बैठ जाए।
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