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आसमान में विमान के पीछे क्यों बनती है सफेद लकीर? जानिए इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण

June 26, 2026

नई दिल्ली। आसमान (The sky) में उड़ते विमान के पीछे अक्सर सफेद रंग की लंबी लकीर दिखाई देती है। कई लोग इसे धुएं का गुबार समझते हैं, जबकि कुछ इसे अलग-अलग दावों से जोड़ते हैं। लेकिन वास्तव में यह एक सामान्य वैज्ञानिक प्रक्रिया (Scientific process) का परिणाम है, जिसका विमान के इंजन, वातावरण के तापमान और हवा में मौजूद नमी से सीधा संबंध होता है।

क्या होती है यह सफेद लकीर?

विमान के पीछे बनने वाली इस सफेद लकीर को कॉन्ट्रेल (Contrail) कहा जाता है। इसका पूरा नाम कंडेन्सेशन ट्रेल (Condensation Trail) है। यह धुआं नहीं बल्कि बर्फ के बेहद सूक्ष्म कणों से बनी एक पतली परत होती है, जो विशेष मौसमीय परिस्थितियों में बनती है।



  • कैसे बनता है कॉन्ट्रेल?

    व्यावसायिक विमान आमतौर पर 30,000 से 40,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं। इस ऊंचाई पर तापमान कई बार -50 से -70 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है।

    विमान के इंजन से निकलने वाली गर्म गैसों में जलवाष्प (वॉटर वेपर) मौजूद होती है। जब यह गर्म जलवाष्प अत्यधिक ठंडी हवा के संपर्क में आती है, तो वह तुरंत संघनित होकर बर्फ के बेहद छोटे-छोटे क्रिस्टल में बदल जाती है। यही बर्फ के कण मिलकर आसमान में सफेद लकीर का रूप लेते हैं।

    क्या यह धुआं होता है?

    नहीं। यह धुआं नहीं होता। इसे सर्दियों में मुंह से निकलने वाली सफेद सांस की तरह समझा जा सकता है। जिस तरह ठंडे वातावरण में गर्म सांस की भाप संघनित होकर दिखाई देने लगती है, उसी तरह विमान के पीछे भी जलवाष्प ठंडी हवा में बर्फ के कणों में बदल जाती है।

    कभी तुरंत गायब और कभी घंटों तक क्यों रहती है?

    कॉन्ट्रेल कितनी देर तक दिखाई देगा, यह पूरी तरह ऊंचाई पर मौजूद मौसम पर निर्भर करता है।

    यदि ऊंचाई पर हवा सूखी है, तो बर्फ के कण जल्दी वाष्पित हो जाते हैं और सफेद लकीर कुछ ही सेकंड या मिनटों में गायब हो जाती है।
    यदि हवा में नमी अधिक है, तो ये कण लंबे समय तक बने रहते हैं और धीरे-धीरे फैलकर बादलों जैसी आकृति भी बना सकते हैं। ऐसे में कॉन्ट्रेल कई घंटों तक दिखाई दे सकता है।
    क्या हर विमान के पीछे यह लकीर बनती है?

    नहीं। हर उड़ान में कॉन्ट्रेल नहीं बनता। इसके बनने के लिए तीन प्रमुख परिस्थितियों का होना जरूरी है—

    विमान पर्याप्त ऊंचाई पर उड़ रहा हो।
    उस ऊंचाई पर तापमान बेहद कम हो।
    वातावरण में पर्याप्त नमी मौजूद हो।

    यदि इनमें से कोई भी स्थिति अनुकूल नहीं होती, तो विमान के पीछे सफेद लकीर दिखाई नहीं देती।

    इस तरह, विमान के पीछे बनने वाली सफेद लकीर कोई रहस्य या धुआं नहीं, बल्कि वातावरण और विमान के इंजन के बीच होने वाली एक सामान्य वैज्ञानिक प्रक्रिया है।

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