
गुवाहाटी। भारत और बांग्लादेश (India and Bangladesh) के बीच चल रहे राजनीतिक तनाव के बावजूद, बांग्लादेश (Bangladesh) अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारत पर निर्भर है। बांग्लादेश पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (Bangladesh Petroleum Corporation- BPC) ने भारत की सरकारी तेल कंपनी नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड (Numaligarh Refinery Limited- NRL) से 180,000 मीट्रिक टन डीजल आयात करने का फैसला किया है। इस आयात की कुल लागत लगभग 14.62 अरब टका होगी जो अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के साथ बदल सकती है। यह सौदा 2026 के लिए हुआ है।
यह फैसला 6 जनवरी को ढाका में हुई सरकारी खरीद सलाहकार समिति की बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता वित्त सलाहकार सालेहुद्दीन अहमद ने की। सरकार संचालित बांग्लादेश पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (बीपीसी) इस डीजल का आयात करेगी। भुगतान का कुछ हिस्सा बीपीसी अपने बजट से करेगी, जबकि शेष राशि बैंक लोन के माध्यम से जुटाई जाएगी।
सूत्रों के अनुसार, आयात लागत एनआरएल के साथ बातचीत के बाद तय की गई है। असम स्थित एनआरएल ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) की सहायक कंपनी है। इस सौदे की कुल वैल्यू 119.13 मिलियन डॉलर तय की गई है, जो 83.22 डॉलर प्रति बैरल की बेस कीमत पर 5.50 डॉलर प्रति बैरल के प्रीमियम पर आधारित है। अंतिम लागत अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के अनुसार बदलती रहेगी।
पत्रकारों के सवालों के जवाब में बिजली, ऊर्जा और खनिज संसाधन सलाहकार मुहम्मद फौजुल कबीर खान ने कहा कि यह आयात पिछले सरकार के कार्यकाल में हस्ताक्षरित 15 वर्षीय दीर्घकालिक समझौते के तहत किया जा रहा है।
एनआरएल की रिफाइनरी असम राज्य में स्थित है। डीजल को पहले सिलीगुड़ी तक ले जाया जाता है और फिर भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन के माध्यम से बांग्लादेश पहुंचाया जाता है। यह पाइपलाइन 2022-23 में चालू हुई थी, जिससे परिवहन लागत और समय में काफी बचत हुई है। इससे पहले डीजल रेलवे वैगनों से आयात किया जाता था। यह आयात बांग्लादेश की बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने में मदद करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन ने दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को मजबूत किया है।
हालांकि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, अल्पसंख्यकों पर हमले और अन्य मुद्दों पर तनाव बना हुआ है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग जारी है। बांग्लादेश की सालाना डीजल मांग का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है और भारत इसका विश्वसनीय स्रोत बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक जरूरतें राजनीतिक तनाव से ऊपर हैं, जिससे ऐसे समझौते बरकरार रहते हैं।
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