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MP: जबलपुर में गोबर-गौमूत्र से गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए रिसर्च के नाम पर करोड़ों का घोटाला

January 11, 2026

भोपाल। मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में गाय के गोबर और गोमूत्र (Cow dung and cow urine) से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों (Serious diseases like Cancer) के इलाज पर रिसर्च (Research) के नाम पर करोड़ों रुपए बर्बाद करने या यूं कहें घोटाले का मामला सामने आया है। यह कारनामा प्रदेश के जबलपुर (Jabalpur) में स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में हुआ है। यहां पर साल 2011 में एक प्रोजेक्ट शुरू किया गया था, जिसमें पंचगव्य की मदद से कैंसर समेत अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज पर खोज करना था।


  • रिसर्च के लिए सरकार से मांगे थे 8 करोड़ रुपए
    पंचगव्य यानी गाय के गोबर व मूत्र के अलावा उसके दूध से बने उत्पादों का मिश्रण। इस रिसर्च के लिए विश्व विद्यालय ने करीब 8 करोड़ रुपए का फंड राज्य सरकार से मांगा था, बदले में सरकार ने 3.5 करोड़ रुपए की फंड जारी भी कर दिया था। हालांकि करीब 15 साल बाद भी कुछ परिणाम नहीं निकले तो सरकार ने रिसर्च कमेटी को जारी फंड की जांच के लिए कमेटी बैठा दी और उसने जो रिपोर्ट दी उसमें चौंकाने वाले खुलासे हुए। इस दौरान अधिकारियों ने इन पैसों से रिसर्च तो नहीं की, लेकिन उनका इस्तेमाल हवाई यात्राएं करने और ऐशोआराम व बंदरबांट करने के लिए किया और कुछ लाख रुपए की मशीनों को लाखों रुपए में भी खरीदना भी बताया।

    शिकायत मिलने के बाद शुरू की गई कार्रवाई
    एक रिपोर्ट के अनुसार, इस रिसर्च प्रोजेक्ट की जांच उस समय शुरू की गई, जब जबलपुर के डिविज़नल कमिश्नर (संभाग आयुक्त) को इस मामले में एक औपचारिक शिकायत मिली, जिसके बाद उन्होंने मामले की जांच के लिए अतिरिक्त कलेक्टर रघुवर मरावी की अध्यक्षता में एक जांच टीम बनाई। जांच पूरी होने के बाद मरावी ने जांच की रिपोर्ट कलेक्टर को सौंप दी है।

    15-20 लाख रुपए का सामान दो करोड़ में खरीदा
    विभिन्न मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जांच के दौरान अधिकारियों के सामने कई चौंकाने वाले खुलासे हुए। इस दौरान प्रारंभिक जांच में पता चला कि रिसर्च के लिए टीम को जो 3.5 करोड़ रुपए आवंटित हुए थे, उनमें से 1.9 करोड़ रुपए तो सिर्फ गोबर, गौमूत्र, बर्तन, कच्चा माल और छोटी-मोटी मशीनों की खरीदी में ही खर्च करना बताया गया। जबकि इन सभी सामानों का वास्तविक बाजार मूल्य केवल 15 से 20 लाख रुपए ही था।

    रिसर्च के नाम पर गोवा-बेंगलुरु में हवाई यात्राएं
    इसके अलावा रिसर्च टीम के सदस्यों ने साल 2012 से 2018 के बीच 24 हवाई यात्राएं कीं, इस दौरान उन्होंने रिसर्च के लिए गोवा और बेंगलुरु जैसे शहरों में जाना बताया। इसके अलावा फंड में से 7.5 लाख रुपए एक कार की खरीदी पर खर्च हुए। वहीं ईंधन और मेंटेनेंस में भी इतनी ही रकम का खर्च होना बताया गया। इसके अतिरिक्त मजदूरी पर लगभग 3.5 लाख रुपए और टेबल व इलेक्ट्रॉनिक सामान पर 15 लाख रुपए खर्च होना बताया गया। जबकि जांच रिपोर्ट में इन सब खर्चों को बिल्कुल गैर जरूरी बताया गया।

    रिसर्च के लिए मिला पैसा अन्य कामों पर खर्च किया
    सबसे खास बात यह है कि पंचगव्य फॉर्मूलेशन का इस्तेमाल करके बीमारियों के इलाज पर जिस रिसर्च के लिए यह पैसा दिया गया था, उस पर कुछ काम ही नहीं हुआ। रिपोर्ट के बारे में जानकारी देते हुए जांच अधिकारी मरावी ने बताया कि ‘कलेक्टर से जांच के निर्देश मिले थे, यूनिवर्सिटी ने पंचगव्य प्रोजेक्ट के लिए सरकार से 8 करोड़ रुपए मांगे थे, और बदले में 3.5 करोड़ रुपए मंजूर किए गए थे।’

    मरावी ने बताया कि ‘प्रोजेक्ट के दौरान कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए पंचगव्य पर रिसर्च किया जाना था, और साथ ही किसानों को कुछ ट्रेनिंग भी दी जानी थी। लेकिन कहीं पर भी यह नहीं बताया गया कि कौन सी ट्रेनिंग दी गई। उन्होंने कहा कि पहली नजर में यही लगता है कि रिसर्च के लिए मिला पैसा दूसरे कामों में खर्च किया गया।

    रजिस्ट्रार बोले- कुछ भी गलत नहीं हुआ
    उधर इन आरोपों के बारे में प्रतिक्रिया देते हुए नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ एसएस तोमर ने यूनिवर्सिटी का बचाव किया और कहा कि यह प्रोजेक्ट साल 2012 से पूरी पारदर्शिता और नियमों का पालन करते हुए चल रहा है। साथ ही उन्होंने किसी भी गड़बड़ी की बात से इनकार किया।

    इस बारे में तोमर ने एक मीडिया हाउस से बातचीत में कहा कि पंचगव्य प्रोजेक्ट 2012 से चल रहा है। सभी खरीदारी, चाहे मशीनें हों या गाड़ियां, ओपन टेंडर के जरिए की गईं। सभी सरकारी नियमों का पालन किया गया और कोई घोटाला नहीं हुआ है। एक ऑडिट भी किया गया था, और सभी सर्टिफिकेट भेजे गए थे। एक जांच समिति आई थी, जिन्हें हमने सभी दस्तावेज दिए। कोई भी तथ्य छुपाया नहीं गया।’ बता दें कि जांच रिपोर्ट अब डिविज़नल कमिश्नर को सौंपी जाएगी, जो इसकी समीक्षा करने के बाद तय करेंगे कि आगे क्या कार्रवाई की जानी है।

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