
नई दिल्ली।हिंदी सिनेमा के महान गायक(the great singer) और अभिनेता किशोर कुमार(Kishore Kumar) सिर्फ अपनी जादुई आवाज के लिए ही नहीं बल्कि अपने अनोखे स्वभाव (a unique personality)के लिए भी पहचाने जाते थे। उन्होंने रोमांस गाया तो दिल पिघल गए, दर्द गाया तो आंखें नम हो गईं और मस्ती भरे गीत गाए तो महफिल झूम उठी। लेकिन उनकी जिंदगी का एक पहलू ऐसा भी था जो उनकी सादगी और गहराई को दर्शाता है। उन्होंने अपनी मौत से पहले(before his death)ही यह तय कर लिया था कि उनका अंतिम संस्कार(before death, funeral) कैसे होगा और कहां होगा।
किशोर कुमार ने अपनी वसीयत में साफ लिखा था कि उनकी मृत्यु के बाद कोई दिखावा न किया जाए। वे नहीं चाहते थे कि उनकी विदाई किसी बड़े आयोजन या फिल्मी समारोह की तरह हो। उनका मानना था कि मौत एक निजी और शांत क्षण होता है जिसे शोर और भीड़ में नहीं बदला जाना चाहिए।
इस बात का खुलासा मशहूर गीतकार और लेखक Javed Akhtar ने एक कार्यक्रम के दौरान किया था। उन्होंने बताया कि एक रिकॉर्डिंग के समय किशोर दा ने उनसे कहा था कि उन्होंने अपनी वसीयत में लिख दिया है कि उनका क्रियाकर्म मुंबई में नहीं बल्कि उनके जन्मस्थान खंडवा में किया जाए। जब उनसे पूछा गया कि ऐसा क्यों तो उन्होंने कहा कि मुंबई में उनकी मौत पर पूरी फिल्म इंडस्ट्री उमड़ पड़ेगी और माहौल किसी प्रीमियर जैसा हो जाएगा। लोग सितारों को देखने आएंगे और शोर शराबा होगा। वे अपनी मौत पर तमाशा नहीं चाहते थे।
किशोर कुमार का कहना था कि वे एक छोटे से शहर से आए थे और उनकी देह उसी मिट्टी की बनी है इसलिए अंत में उसी मिट्टी में लौट जाना चाहते हैं। यही वजह रही कि उनके निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार खंडवा में ही किया गया और आज भी वहां उनकी समाधि मौजूद है। यह उनकी सादगी और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की सोच को दर्शाता है।
किशोर कुमार का व्यक्तित्व जितना गंभीर था उतना ही शरारती भी। वे अक्सर अपने अंदाज से लोगों को चौंका देते थे। इसका एक दिलचस्प उदाहरण 1974 में आई फिल्म Aap Ki Kasam से जुड़ा है। इस फिल्म में Rajesh Khanna और मुमताज मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म का मशहूर गीत जय जय शिवशंकर आज भी लोगों को झूमने पर मजबूर कर देता है। इस गाने को किशोर कुमार ने अपनी आवाज दी थी और इसका संगीत R. D. Burman ने तैयार किया था।
कहा जाता है कि फिल्म के निर्माता बार बार आरडी बर्मन को गाने पर अधिक खर्च को लेकर ताने दे रहे थे। जब यह बात किशोर कुमार तक पहुंची तो उन्होंने अपने अंदाज में जवाब दिया। गाने के अंत में उन्होंने एक पंक्ति गाई अरे बजाओ रे बजाओ 50 हजार खर्च हो गए। यह पंक्ति दरअसल निर्माता पर व्यंग्य थी। इस तरह उन्होंने बिना सीधे कुछ कहे अपनी बात कह दी।
किशोर कुमार की जिंदगी में शोहरत की कोई कमी नहीं थी लेकिन वे भीतर से बेहद संवेदनशील और जमीन से जुड़े इंसान थे। उन्होंने अपनी आखिरी इच्छा में भी यही दिखाया कि इंसान चाहे जितना बड़ा सितारा बन जाए उसकी जड़ें उसकी असली पहचान होती हैं। उनकी आवाज आज भी जिंदा है और उनकी सोच भी लोगों को उतनी ही गहराई से छूती है।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved