
तुम दीपक हो, दीपक ही रहो… मोहम्मद बनने की कोशिश मत करो… दरियादिली दिखाओगे… मोहम्मद बनकर मोहब्बत जताओगे… हिन्दुओं की भावनाओं को समझ नहीं पाओगे तो इस देश में कैसे रह पाओगे… लेकिन कोटद्वार में रहकर, जिम चलाने वाले दीपक ने हिमाकत दिखाई और एक मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद के समर्थन में तब आवाज उठाई, जब बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने अहमद की बाबा नाम की कपड़े की दुकान का नाम बदलने के लिए मजमा जमाया… तब उत्साहित दीपक ने सौहार्दता का मसीहा बनने के उतावलेपन में न केवल बजरंगियों से मुकाबला किया, बल्कि खुद को मोहम्मद दीपक बताकर बजरंगियों को चलता करना चाहा… तब जो झगड़ा-फसाद होना था हुआ… पुलिस ने प्रकरण भी दर्ज कर लिया… मामला देशभर की सुर्खियों में भी रहा… लेकिन असली खेल तो उसके बाद शुरू हुआ… खुद को मोहम्मद बनाने… मोहब्बत जताने और हिम्मत दिखाने की सजा में कई हिन्दुओं ने दीपक के जिम से किनारा कर लिया… जो बच गए उनके घर जा-जाकर बजरंगियों ने धमकाया और उनका जिम जाना बंद कराया… सौहार्दता की हिम्मत दिखाने वाले दीपक का चिराग ऐसा बुझा कि उसे जिम का किराया देने के लाले पड़ गए… उसे खाने के फाके पड़ गए… कंगाली के कगार पर खड़े दीपक को धमकियां मिल रही हैं… रात जागते गुजर रही है… दीपक इस गलतफहमी का शिकार थे कि उन्हें सांप्रदायिक सौहार्दता के नाम पर सराहा जाएगा… हर कोई कांधे पर उठाएगा… लेकिन उसे क्या पता था कि वो अपनी इस कोशिश में मारा जाएगा… घरवालों के लिए मुसीबत बन जाएगा… उसे क्या पता था कि नफरत के बाजार में वो यदि मोहब्बत की दुकान लगाएगा तो पूरा बाजार ही फूंक दिया जाएगा… अब तक पढ़ा राम-रहीम का पाठ हर कोई भूल जाएगा… नई सदी का नया मिजाज सामने आएगा… जहां देश एक नई पहचान बनाने की कोशिश में लगा हुआ है… वर्गभेद इस तरह उभर चुका है कि दिल की दूरी दिमाग में चढ़ गई है… अब कोई दीपक कभी मोहम्मद बनने की कोशिश नहीं करेगा और न कोई मोहम्मद किसी दीपक से उम्मीद रख सकेगा… उत्तराखंड में चाहे जो हुआ हो, पर सच तो यह है कि सौहार्द के बुझते दीपक अब जल नहीं पाएंगे….
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