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स्वराज्य ही उनके लिए सर्वस्‍व था : छत्रपति संभाजी महाराज

March 11, 2026

-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय इतिहास के पन्नों को जब भी पलटा जाएगा, तब वीरता, संघर्ष और स्वराज्य की रक्षा के प्रेरणापुंज छत्रपति संभाजी महाराज का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाएगा। उनका संपूर्ण जीवन अदम्य साहस, अटूट आत्मसम्मान और धर्म तथा स्वराज्य के लिए सर्वोच्च बलिदान की प्रेरक गाथा है। 11 मार्च 1689 का दिन भारतीय इतिहास में उस अमर क्षण के रूप में अंकित है, जब ‘स्वराज्य’ के इस महान रक्षक ने औरंगजेब की इस्‍लामिक जिहादी क्रूर यातनाओं के सामने झुकने की बजाय अपने प्राणों का बलिदान देना ही उचित माना। यही कारण है कि उन्हें भारत के राष्‍ट्रीय चेतना के हिन्‍दू-सनातन भाव भरे इतिहास में स्वराज्य रक्षक के रूप में स्मरण किया जाता है।

छत्रपति संभाजी महाराज का जन्म 14 मई 1657 को पुरंदर किले में हुआ था। उनकी माता साईबाई थीं, जो छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रथम पत्नी थीं। दुर्भाग्य से संभाजी महाराज की माता का निधन तब हो गया जब वे मात्र दो वर्ष के थे। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी वीरमाता जीजाबाई ने किया। जीजाबाई ने बचपन से ही उनमें धर्म, साहस, स्वाभिमान और स्वराज्य की रक्षा के संस्कार भर दिए। यही संस्कार आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति बने।

प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार अपनी पुस्तक ‘शिवाजी एंड हिज टाइम्स’ में लिखते हैं, “शिवाजी की पहली पत्नी साईबाई से 14 मई 1657 को उनके ज्येष्ठ पुत्र संभाजी का जन्म हुआ।” (पृष्ठ 64) यह दिन उस महान व्यक्तित्व की शुरुआत है जिसने आगे चलकर मराठा साम्राज्य की रक्षा में अद्वितीय भूमिका निभाई। संभाजी महाराज बचपन से ही अत्यंत तेजस्वी, साहसी और बुद्धिमान थे। मात्र नौ वर्ष की आयु में उन्हें 1665 की पुरंदर संधि के बाद मुगलों के पास राजनीतिक बंधक के रूप में भेजा गया। वहाँ उन्हें आमेर के राजा जयसिंह प्रथम के साथ रहना पड़ा। मुगल दरबार की राजनीति, कूटनीति और शक्ति के स्वरूप को उन्होंने बहुत निकट से देखा। यह अनुभव उनके जीवन का पहला राजनीतिक पाठ था, जिसने उनके व्यक्तित्व को और अधिक दृढ़ बना दिया।


  • इतिहासकार स्टुअर्ट गॉर्डन ‘द मराठाज 1600–1818’ पुस्तक में लिखते हैं कि “बचपन में ही संभाजी ने असाधारण बुद्धिमत्ता और साहस का परिचय दिया, जिसने आगे चलकर उनके नेतृत्व को आकार दिया।”(पृष्ठ 88)। वस्‍तुत: 1680 में छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद मराठा साम्राज्य में उत्तराधिकार को लेकर संकट उत्पन्न हो गया। शिवाजी महाराज की दूसरी पत्नी सोयराबाई अपने पुत्र राजाराम को सिंहासन पर बैठाना चाहती थीं। इससे राज्य में राजनीतिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई। लगभग नौ महीनों तक चली इस स्थिति के बाद सेनापति हम्बीरराव मोहिते और अन्य प्रमुख मराठा सरदारों के समर्थन से 1681 में संभाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ और वे मराठा साम्राज्य के छत्रपति बने।

    इसका विस्‍तारित उल्‍लेख इतिहासकार गोविंद सखाराम सरदेसाई ने पुस्तक ‘न्यू हिस्ट्री ऑफ द मराठाज खंड 1’ में बहुत विस्‍तार से किया है, उनका कहना हैकि “संक्षिप्त संघर्ष के बाद 1681 में संभाजी ने प्रमुख मराठा सरदारों के समर्थन से सिंहासन ग्रहण किया।”(पृष्ठ 322)। छत्रपति बनने के बाद संभाजी महाराज ने अपने पिता की स्थापित हिंदवी स्वराज्य की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने प्रशासन को सुदृढ़ किया, योग्य अधिकारियों की नियुक्ति की और आठ मंत्रियों की परिषद को सक्रिय बनाए रखा। उन्होंने न्याय व्यवस्था को मजबूत किया और प्रजा के कल्याण को सर्वोपरि माना। उनके शासन में अनुशासन, संगठन और प्रशासनिक क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलता है।

    संभाजी महाराज एक महान योद्धा होने के साथ ही विद्वान और साहित्यप्रेमी भी थे। उन्हें संस्कृत और मराठी भाषा का गहन ज्ञान था। उन्होंने बुधभूषण, नायिकाभेद और सतशतक जैसी साहित्यिक रचनाएँ भी कीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे युद्ध के साथ-साथ संस्कृति और ज्ञान के भी संरक्षक थे। इतिहासकार कमल गोखले अपनी पुस्तक ‘संभाजी’ में उनके इस व्‍यक्‍तित्‍व के गुण पर गहराई से प्रकाश डाला है, वे लिखती हैं, “लगातार युद्धों के बावजूद संभाजी ने साहित्य और विद्वता को प्रोत्साहित किया और स्वयं संस्कृत ग्रंथों की रचना की।”(पृष्ठ 145)।

    दूसरी ओर यह भी उनके जीवन का बड़ा सत्‍य है कि संभाजी महाराज का अधिकांश शासनकाल युद्धों में बीता। मुगल सम्राट औरंगजेब इस्‍लाम की जिहादी मानसिकता की पराकाष्‍ठा तक भरा हुआ था, उसे हिन्‍दू एक आंख नहीं सुहाते थे, ऐसे में वो हिन्‍दवी स्‍वराज्‍य को कैसे स्‍वीकार्य कर सकता था, वो मराठा साम्राज्य को समाप्त करना चाहता था। इसी उद्देश्य से वह स्वयं विशाल सेना लेकर दक्षिण भारत आ गया। 1682 से 1688 तक संभाजी महाराज ने मुगलों, पुर्तगालियों और अन्य शत्रुओं के विरुद्ध लगातार युद्ध किए। उन्होंने अपने पिता शिवाजी महाराज की गुरिल्ला युद्ध नीति को अपनाया। इस युद्ध नीति में अचानक आक्रमण करना, घात लगाकर हमला करना और तुरंत पीछे हट जाना शामिल था। इस रणनीति के कारण मुगलों की विशाल सेना भी मराठों के सामने कई बार असहाय हो जाती थी।

    इतिहासकार जदुनाथ सरकार शिवाजी महाराज की गुरिल्ला युद्ध नीति पर विस्‍तार से लिखते हैं, और अपनी पुस्‍तक में संभाजी द्वारा इसके उपयोग पर गहराई से बात करते हैं, वे कहते हैं- “संभाजी ने शिवाजी की गुरिल्ला युद्ध नीति को आगे बढ़ाया और औरंगजेब का अत्यंत दृढ़ता से प्रतिरोध किया।”(जदुनाथ सरकार, हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब, खंड 5, पृष्ठ 231)। हालाँकि 1687 में वाई के युद्ध में मराठा सेना के महान सेनापति हम्बीरराव मोहिते वीरगति को प्राप्त हो गए। इससे मराठा सेना का मनोबल प्रभावित हुआ और परिस्थितियाँ धीरे-धीरे कठिन होती गईं। अंततः 1 फरवरी 1689 को संगमेश्वर में शिरके कबीले के कुछ लोगों के विश्वासघात के कारण मुगल सेनापति मुकर्रब खान ने संभाजी महाराज को बंदी बना लिया। उनके साथ उनके प्रिय मित्र और विद्वान कवि कलश भी बंदी बनाए गए।

    संभाजी महाराज को औरंगजेब के सामने प्रस्तुत किया गया। औरंगजेब ने कई दिनों तक उन्हें अमानवीय यातनाएँ दीं और इस्लाम स्वीकार करने के लिए दबाव डाला। लेकिन संभाजी महाराज अपने धर्म, स्वाभिमान और स्वराज्य के आदर्शों से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इतिहासकार सरदेसाई इस प्रसंग का वर्णन कुछ इस तरह से करते हैं, “अत्यंत कठोर यातनाओं के बावजूद संभाजी ने औरंगजेब के सामने झुकने से इंकार कर दिया।” उन्‍हें भयंकर प्रताड़नाएं दी गईं, कई दिन भूखा रखा गया, शरीर का रोम-रोम अलग कर दिया गया, किंतु स्‍वधर्म की रक्षा एवं हिन्‍दुत्‍व के लिए अपना सर्वस्‍व समर्पण कर चुके महान संभाजी महाराज को बहुत कष्‍ट देकर भी औरंगजेब उन्‍हें उनके विचारों एवं हिन्‍दुत्‍व के प्रति उनके संकल्‍प से डिगा न सका। (जी. एस. सरदेसाई, न्यू हिस्ट्री ऑफ द मराठाज, खंड 1, पृष्ठ 348)।

    अंततः 11 मार्च 1689 को पुणे के निकट तुलापुर में भीमा नदी के तट पर उनका सिर कलम कर दिया गया। किंतु मृत्यु के उस अंतिम क्षण तक उनका साहस और आत्मबल अडिग रहा। अनेक ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, यातनाओं के बीच भी उनके मुख से हर हर महादेव और जय भवानी के उद्घोष निकलते रहे। वस्‍तुत: यह भारत में अपने समय में हुई एक राजा की मृत्यु नहीं थी, बल्कि धर्म, स्वाभिमान और स्वराज्य की रक्षा के लिए दिया गया अमर बलिदान था। संभाजी महाराज हुतात्‍मा हो चुके थे, पर उनके इस बलिदान ने मराठा साम्राज्य के संघर्ष को और अधिक प्रबल बना दिया। उनके बलिदान ने मराठा सैनिकों के भीतर नई ऊर्जा और संकल्प का संचार किया।

    इतिहासकार स्टुअर्ट गॉर्डन ने लिखा, “संभाजी की शहादत मुगल प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गई।” (द मराठाज 1600–1818, पृष्ठ 102)। आज भी संभाजी महाराज का जीवन हमें अपने हिन्‍दुत्‍व के लिए सर्वस्‍व बलिदान कर देने की प्रेरणा दे रहा । उनके जीवन का संदेश यही है कि जब राष्ट्र, धर्म और स्वतंत्रता पर संकट आए, तब एक सच्चा वीर अपने प्राणों की परवाह किए बिना संघर्ष करता है। आज 11 मार्च को उनकी पुण्यतिथि सिर्फ श्रद्धांजलि का अवसर नहीं है, यह हमें उनके आदर्शों को स्मरण करने और उनसे प्रेरणा लेने का अवसर प्रदान करती है।

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