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ये पॉलिटिक्स है प्यारे

April 27, 2026

आईडीए में आएगा चौंकाने वाला नाम?
लो भाई, कल उज्जैन (Ujjain) सहित कुछ शहरों के विकास प्राधिकारिणों (Development Authorities) के नाम भी आ गए, लेकिन हर बार की तरह इंदौर (Indore) को लटका दिया गया है। मुख्यमंत्री के प्रभार वाले शहर में वे जिसे चाहेंगे वह आईडीए बिल्डिंग में जाकर बैठेगा, लेकिन जो नाम चल रहे हैं, वे नाम हटाकर कोई चौंकाने वाला नाम सामने आ सकता है। फिलहाल तो हरिनारायण यादव का नाम सामने आ रहा है, वहीं जिस तरह से दूसरे कुछ जिलों में सिंधिया समर्थकों को तवज्जो मिली है, उसमें संजय शुक्ला भी अपने लिए संभावना तलाश रहे हैं। सुदर्शन गुप्ता और गोपी नेमा जैसे नेता भी लगे हुए हैं, ताकि राजनीति का अंतिम दौर भी आसानी से गुजर जाए। एक नया नाम कमलेश शर्मा का भी उभरा है, जो दो नंबर के करीबी तो हैंं, वहीं संघ और संगठन में भी काम कर चुके हैं। फिर भी भोपाल वाले कह रहे हैं कि नाम तो चौंकाने वाला ही आएगा।

सांसद की दौड़ में तो नहीं ठाकुर
महू विधायक उषा ठाकुर की सक्रियता इन दिनों महू में जोरों पर है, जिसकी आवाज इंदौर तक भी आ रही है। वैसे इंदौर में जनसंख्या के आधार पर अगर लोकसभा क्षेत्र दो हो जाते हैं तो उषा ठाकुर अपनी दावेदारी जता सकती हैं। हालांकि महिला आरक्षण बिल लागू होने के बाद एक न एक सीट पर महिला प्रत्याशी खड़ी की जा सकती थी, लेकिन ये बिल भी विफल हो गया। यूं भी तत्कालीन वीडी शर्मा के नजदीक रही कविता पाटीदार अब पार्टी के आयोजनों से दूरी बनाकर चल रही हैं, जबकि ठाकुर इंदौर के आयोजनों में भी नजर आ रही हैं। अगर ऐसा ही रहा तो ठाकुर सांसद की दौड़ में आगे निकल सकती हैं।

ठंडी पड़ रही कांग्रेस की कमेटी
नगर निगम के सम्मेलन के दौरान वंदे मातरम नहीं गाने वाली दोनों महिला मुस्लिम पार्षदों की शिकायत दिल्ली तक पहुंची है और वहां से कमेटी बना दी गई, जिसमें प्रदेश प्रभारी रहे संजय दत्त और संभागीय प्रभारी उषा नायडू को भी शामिल किया गया है। कमेटी कुछ कर पाती, इसके पहले ही दोनों पार्षदों को भोपाल तलब किया गया है। बताया जा रहा है कि कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन ऊपर तक इसकी जानकारी पहुंच चुकी है। अब दोनों पर किस प्रकार की कार्रवाई होती है, इसका इंतजार किया जा रहा है या फिर मामले को टालकर कांग्रेस के पार्षदों की संख्या कम नहीं की जाएगी।

उम्मीद तो हैं, लेकिन भाजपाई माने तब
भाजपा में शामिल हुए विशाल पटेल एक बार फिर देपालपुर विधानसभा क्षेत्र पर नजर गढ़ाए बैठे हैं। कांग्रेस से टिकट मिलने का तो प्रश्न रहा, लेकिन भाजपाई भी उनकी दाल गलने नहीं देंगे। फिलहाल तो मनोज पटेल ही अपने आपको यहां का प्रबल दावेदार मानकर चल रहे हैं तो मनोज की टांग खींचने में भाजपा के कुछ नेता भी अभी से ही सक्रिय हो गए हैं। मनोज जिस तरह से शिवराजसिंह चौहान के करीबी थे, वे अब मोहन यादव के भी खास होने का दावा कर रहे हैं। ऐसे वे नजर नहीं आते, लेकिन जैसे ही मुख्यमंत्री का दौरा होता है, हाथ में दुपट्टा लिए एयरपोर्ट पहुंच जाते हैं। दूसरी ओर सत्यनारायण पटेल और राधेश्याम पटेल एक बार फिर यहां से दम लगा रहे हैं। कुल मिलाकर मुकाबला रोमांचक होने वाला है और फिलहाल यहां तो विशाल पटेल के लिए कोई गुंजाइश दिख नहीं रही।

भाजपा भी चल पड़ी कांग्रेस की राह पर
पिछले दिनों इंदौर में प्रदेश लेवल का एक कार्यक्रम हुआ, जिसे भाजपा के एक नेता ने आयोजित किया था। उक्त नेता की प्रतिष्ठा आयोजन से जुड़ी थी और भीड़ जुटाना उनके लिए जरूरी थी, लेकिन आम कार्यकर्ताओं की दूरी कार्यक्रम से थी तो उन्होंने ऐसे युवाओं को हायर किया, जिनका राजनीति से दूर-दूर का वास्ता नहीं था। ये युवा दर्शक दीर्घा में अलग ही चेहरे के रूप में नजर आ रहे थे। आपको बता दें कि यह आयोजन उन नेता की याद में किया गया था, जो प्रदेश की राजनीति में कभी अपना एक ऊंचा मुकाम रखते थे। हालांकि बाद में नगर संगठन के निशाने पर वे नेता रहे, जिनके आयोजन में भीड़ नहीं आई थी और भाड़े के श्रोता लाना पड़े। जिन लोगों को भाड़े की भीड़ की जानकारी लगी, उन्होंने यही कहा कि अब भाजपा भी कांग्रेस की तरह भीड़ लाने में लगी है, जहां भाड़े के कार्यकर्ताओं को लाया जाता है।

मुंह पर कंट्रोल नहीं रहता
भाजपा की एक महिला पार्षद जो एक बड़े नेता की मेहरबानी से अपने नाम की शोभा बढ़ा रही हैं, वे जब चाहे तब कुछ भी बोल देती हैं। कहते हैं मेडम अपने आपको किसी बड़े जनप्रतिनिधि से कम आंकती नहीं है। अभी महिला आरक्षण की ही बात ले लो। जब महिलाएं राजबाड़ा पहुंची तो उनका आचरण भी वही था, जिसको लेकर कुछ महिला नेत्रियां नाराज रहीं। आपको बता दें मेडम अध्यक्ष की दौड़ में भी हैं।

आयोजनों में भूल गए आजीवन सहयोग निधि
पिछले एक माह से भाजपा के पास काम पर काम आते जा रहे हैं। पहले प्रशिक्षण वर्ग, उसके बाद बाबा साहेब आम्बेडकर, फिर महिला आरक्षण बिल और अब बिल का विरोध करने वालों का विरोध करने के निर्देश प्राप्त होने वाले हैं। इस बीच वन्दे मातरम भी छाया रहा। इसी के प्रदर्शन में भाजपा में लगी रही और आजीवन सहयोग निधि जैसा अभियान भूल गई।

कांग्रेस और भाजपा में इन दिनों अपने-अपने आयोजनों में वंदे मातरम गाने की होड़ मची हुई है। भले ही राजनीतिक फायदे के लिए राष्ट्रगीत गाया जा रहा हो, लेकिन दोनों दलों में कौन-कब तक वंदे मातरम गा पाएगा, ये देखा जाएगा। फिलहाल तो ये पॉलिटिक्स है प्यारे…आगे-आगे देखिए होता है क्या? -संजीव मालवीय

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