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खाड़ी देश दो खेमों में बंटे, कोई युद्ध रोकने के पक्ष में तो कोई ईरान पर हमले तेज करने की मांग में

March 28, 2026

तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध (West Asia War) का 28वां दिन और तनावपूर्ण हो गया है। ईरान (Iran) ने खाड़ी क्षेत्र के कई अहम ठिकानों पर फिर हमले किए हैं, जिससे संकट और गहरा गया है। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरानी ऊर्जा ठिकानों पर संभावित हमलों को आगे बढ़ाते हुए तेहरान को चेतावनी दी है कि वह (Strait of Hormuz) को खोले, अन्यथा उसके ऊर्जा संयंत्र निशाने पर आ सकते हैं।

ट्रंप ने जलडमरूमध्य खोलने की समयसीमा 7 अप्रैल तक बढ़ाते हुए दावा किया कि ईरान के साथ बातचीत “अच्छी” चल रही है, लेकिन दबाव की रणनीति जारी रहेगी।



  • खाड़ी देश दो फाड़
    ईरान को लेकर खाड़ी के मुस्लिम देश अलग-अलग रुख अपनाते दिख रहे हैं। कतर, ओमान और कुवैत आर्थिक नुकसान और जवाबी हमलों के डर से युद्ध जल्द खत्म करने की वकालत कर रहे हैं।

    सूत्रों के मुताबिक, खाड़ी देश कतर, ओमान और कुवैत और Bahrain का मानना है कि जब तक ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता खत्म नहीं होती, तब तक उस पर हमले जारी रहने चाहिए। इन देशों का कहना है कि अधूरा समझौता भविष्य में फिर संकट पैदा कर सकता है।

    अमेरिका से सख्त समझौते की मांग
    खाड़ी देशों ने निजी बातचीत में अमेरिका से कहा है कि किसी भी समझौते में ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं पर स्थायी रोक, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। उनका जोर इस बात पर है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को भविष्य में हथियार की तरह इस्तेमाल न किया जा सके।

    बार-बार हमलों से बढ़ी चिंता
    खाड़ी देशों का कहना है कि ईरान ने युद्ध के दौरान उनके ऊर्जा और नागरिक ठिकानों को निशाना बनाया है। इसलिए वे ऐसे व्यापक समझौते की मांग कर रहे हैं जिसमें प्रॉक्सी युद्ध, तेल मार्गों की सुरक्षा और समुद्री यातायात की गारंटी शामिल हो।

    एमिरेट्स पॉलिसी सेंटर की प्रमुख Ebtesam Al-Ketbi ने कहा कि असली चुनौती सिर्फ युद्ध रोकना नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसे संकट से बचाव सुनिश्चित करना है। वहीं अमेरिका में यूएई के राजदूत Yousef Al Otaiba ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता की परीक्षा बताया।

    सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया आकलन में ईरान के मिसाइल भंडार का करीब एक-तिहाई हिस्सा नष्ट होने का अनुमान है, लेकिन उसकी क्षमताएं अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। ऐसे में खाड़ी देश 2015 के परमाणु समझौते से अधिक व्यापक नए समझौते की मांग कर रहे हैं, ताकि पूरे क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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