
नई दिल्ली: दुनिया में एक फिर से मौसम का सबसे खतरनाक खतरा मंडरा रहा है. मिली जानकारी के अनुसार, प्रशांत महासागर में तेजी से अल नीनो की स्थिति विकसित हो रही है जो बेहद ताकतवर रूप ले सकती है. मौसम वैज्ञानिकों के लिए यह स्थिति विकसित हो रही है, जो बेहद ताकतवर रूप ले सकती है.
2026 में भी आ रहा सुपर अल नीनो?
मौसम वैज्ञानिकों के लिए यह किसी बुरे सपने के सच होने जैसा है, क्योंकि 1877 में जब इसी तरह का भयंकर ‘सुपर अल नीनो’ आया था, तब दुनिया भर में करोड़ों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. ताजा मौसम जानकारी के अनुसार, 2026 में भी कुछ ऐसे ही हालात बनते दिख रहे हैं, जिसने भारत समेत पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है.
1877 का वो खौफनाक इतिहास
जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और 1877-1878 के इतिहास को देखते हैं तो इसमें ‘सुपर अल नीनो’ को सबसे विनाशकारी मौसमी घटनाओं में गिना जाता है. उस दौरान इसके प्रभाव से भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों में भयंकर सूखा पड़ा था. बारिश न होने के कारण फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई थीं. इतिहास में इसे ‘ग्रेट फेमाइन’ कहा जाता है. इस अकाल के कारण भुखमरी और बीमारियों से दुनिया भर में करोड़ों लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी. वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र की सतह के तापमान में अत्यधिक वृद्धि उस सदी के सबसे बड़े जलवायु संकट का कारण बनी थी.
क्या 2026 में बन रहे वैसे ही हालात?
वहीं, ताजा वैज्ञानिक आकलनों (NOAA और WMO) के अनुसार, इस साल मई से जुलाई के बीच अल नीनो के पूरी तरह से उभरने की प्रबल आशंका है. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान (SST) सामान्य से काफी तेजी से बढ़ रहा है. दुनिया भर के जलवायु विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते इस बार यह मौसमी घटना और भी भयानक रूप ले सकती है.
भारत पर कितना पड़ेगा असर?
भारत के लिए यह खबर किसी बड़े खतरे की घंटी से कम नहीं है. प्रशांत महासागर में होने वाले इस बदलाव का सीधा असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर पड़ता है. ‘सुपर अल नीनो’ के कारण इस साल मानसून कमजोर पड़ सकता है. उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में सूखे और भीषण लू का गंभीर संकट खड़ा होने की आशंका है.
कम बारिश की है आशंका
सामान्य तौर पर भारत में मानसून के दौरान लगभग 780 मिलीमीटर बारिश होती है, लेकिन इस बार इसके घटकर 800 मिमी के आसपास या फिर उससे भी कम रहने की आशंका है.
किसानों पर पड़ेगी दोहरी मार
भारत की लगभग 60 फीसदी खेती आज भी मानसून पर निर्भर है. अगर बारिश कम होती है तो इसका असर खरीफ की फसलों पर पड़ेगा. फसल उत्पादन घटने से किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट आ सकता है.
महंगाई और पानी की किल्लत
खराब मानसून का अर्थ है खाद्य पदार्थों (सब्जियों और दालों) की कीमतों पर पड़ेगा और इनके दामों में भारी उछाल हो सकता है और पीने के पानी की भी कमी हो सकती है.
IMD रख रही बदलावों पर नजर
मौसम विज्ञान विभाग और तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं प्रशांत महासागर में हो रहे इन बदलावों पर करीब से नजर रख रही हैं. हालांकि, अल नीनो का असर हर बार विनाशकारी हो, यह जरूरी नहीं है लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में इसकी तीव्रता ने नीति निर्माताओं को अलर्ट मोड पर ला दिया है.
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