
नई दिल्ली । कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Congress leader Rahul Gandhi) ने कहा कि बड़े सार्वजनिक ठेकों में (In large Public Contracts) दलित, आदिवासी और ओबीसी उद्यमियों (Dalit, Tribal and OBC Entrepreneurs) की घोर उपेक्षा की गई (Are grossly Neglected) ।
उन्होंने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि पिछले साल 16,500 करोड़ रुपए के सार्वजनिक निर्माण ठेकों में कितने ठेके दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के व्यवसायों को मिले, इसका पता लगाने की कोशिश की तो जवाब बहुत चिंताजनक मिला। सरकार के पास इसका कोई डाटा ही नहीं है। दरअसल, राहुल गांधी ने लोकसभा में एक प्रश्न (अतारांकित प्रश्न संख्या 6264) उठाया था, जिसमें पिछले पांच साल में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा दिए गए सार्वजनिक निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर ठेकों की कुल संख्या और मूल्य की जानकारी मांगी गई थी। साथ ही यह भी पूछा गया कि कितने ठेके एससी/एसटी और ओबीसी स्वामित्व व्यवसायों को दिए गए और क्या सरकार ने 4 प्रतिशत का लक्ष्य पूरा किया, जो एससी/एसटी स्वामित्व उद्यमों के लिए तय किया गया है। राहुल गांधी ने यह भी पूछा कि क्या ओबीसी स्वामित्व व्यवसायों के लिए भी ऐसा लक्ष्य बनाने की योजना है।
इस सवाल के जवाब में केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री तोखन साहू ने बताया कि कुल ठेकों का डाटा तो उपलब्ध है, लेकिन एससी/एसटी और ओबीसी स्वामित्व वाले व्यवसायों को दिए गए ठेकों का कोई मौजूदा ट्रैकिंग सिस्टम नहीं है। इसका कारण यह बताया गया कि निर्माण ठेकों के लिए यह ट्रैकिंग अनिवार्य नहीं है। राहुल गांधी ने कहा कि सरकार की नीति कहती है कि लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) से कम से कम 25 प्रतिशत सार्वजनिक खरीद होनी चाहिए, जिसमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के स्वामित्व वाले व्यवसायों के लिए 4 प्रतिशत शामिल है, लेकिन सबसे बड़े और मुनाफेदार ठेकों यानी सार्वजनिक निर्माण के ठेकों में सरकार कहती है कि यह अनिवार्य नहीं है।
राहुल गांधी ने इसे केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक ऐसा सिस्टम बताया जो जानबूझकर मोदी सरकार की नीतियों के जरिए सामाजिक और आर्थिक न्याय को कमजोर करता है। संसदीय डाटा के अनुसार, पिछले पांच साल में केंद्रीय सार्वजनिक निर्माण ठेकों की संख्या और मूल्य लगातार बढ़ते रहे हैं। केवल 2025-26 में ही 8,402 ठेके दिए गए, जिनकी कुल कीमत 16,587 करोड़ रुपए है।
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