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महासौभाग्य देने वाली ज्येष्ठ पूर्णिमा पर बने कई शुभ योग, दान-पुण्य और पूजा से समृद्धि बढ़ने की मान्यता

June 01, 2026

नई दिल्ली । लगभग आठ वर्षों के अंतराल के बाद आई ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा (Jyeshtha Adhik Purnima) इस बार धार्मिक आस्था, ज्योतिषीय मान्यताओं और खगोलीय घटनाओं के विशेष संयोग के कारण चर्चा का विषय बनी हुई है। श्रद्धालुओं और धर्माचार्यों के अनुसार यह पूर्णिमा (Full Moon) कई दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस दिन एक ओर जहां अधिक मास (Extra Lunar Month) की पूर्णिमा का संयोग बना है, वहीं दूसरी ओर यह मई महीने की दूसरी पूर्णिमा होने के कारण ब्लू मून (Blue Moon) की श्रेणी में भी शामिल हो गई है। इसके साथ ही इस अवसर पर माइक्रोमून (Micro Moon) की स्थिति भी देखने को मिली, जिसने इस तिथि को और अधिक विशेष बना दिया।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मास को भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है और इस दौरान किए गए जप, तप, दान तथा पूजा-पाठ का विशेष महत्व बताया गया है। ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा पर स्नान, दान और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होने की मान्यता है। श्रद्धालुओं ने विभिन्न धार्मिक स्थलों, नदी घाटों और मंदिरों में पहुंचकर पूजा-अर्चना की तथा पुण्य लाभ अर्जित करने के लिए दान-पुण्य के कार्य किए।

पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा तिथि 30 मई की सुबह प्रारंभ होकर 31 मई की दोपहर तक प्रभावी रही। इस अवधि में श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजा कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि और आर्थिक उन्नति की कामना की। धार्मिक विद्वानों का कहना है कि अधिक मास में आने वाली पूर्णिमा विशेष फलदायी मानी जाती है क्योंकि यह आध्यात्मिक साधना और पुण्य कर्मों के लिए अनुकूल अवसर प्रदान करती है।

खगोलीय दृष्टि से भी यह पूर्णिमा महत्वपूर्ण रही। मई महीने में दूसरी बार पूर्णिमा होने के कारण इसे ब्लू मून कहा गया। हालांकि चंद्रमा का रंग वास्तव में नीला नहीं दिखाई देता, लेकिन खगोल विज्ञान में एक ही कैलेंडर महीने में दो पूर्णिमाओं के होने की स्थिति को ब्लू मून कहा जाता है। इसके साथ ही इस दिन चंद्रमा पृथ्वी से अपेक्षाकृत अधिक दूरी पर स्थित रहा, जिसके कारण उसे माइक्रोमून की श्रेणी में रखा गया। इस स्थिति में चंद्रमा सामान्य पूर्णिमा की तुलना में थोड़ा छोटा दिखाई देता है।

धार्मिक परंपराओं के अनुसार ज्येष्ठ मास में गर्मी का प्रभाव अधिक होने के कारण जल, शीतल पेय पदार्थ, फल तथा जरूरतमंद लोगों की सहायता को विशेष पुण्यदायी माना गया है। इसी मान्यता के तहत लोगों ने जल से भरे पात्र, शरबत, मौसमी फल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान किया। कई स्थानों पर राहगीरों और जरूरतमंदों के लिए जल सेवा और भोजन वितरण के आयोजन भी किए गए।

धर्मशास्त्रों में इस दिन गरीबों, जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र तथा अन्य उपयोगी सामग्री दान करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि ऐसे कार्यों से न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है, बल्कि परिवार में सुख, शांति और आर्थिक स्थिरता भी बनी रहती है। इसी कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य कर इस विशेष अवसर को धार्मिक आस्था और सामाजिक सेवा के रूप में मनाया।

  • ज्योतिषीय मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि इस प्रकार के दुर्लभ संयोग लंबे समय बाद बनते हैं और इन्हें शुभ अवसर के रूप में देखा जाता है। इसलिए ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा को लेकर देशभर में धार्मिक उत्साह और श्रद्धा का वातावरण देखने को मिला।

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