पटना। बिहार में सत्ता बदलाव के साथ ही शराबबंदी कानून (Prohibition law) पर नई बहस छिड़ गई है। नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के पद से हटते ही यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या राज्य में वर्षों से लागू शराबबंदी खत्म की जा सकती है।
सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं के बयान इस बहस को और हवा दे रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या सम्राट चौधरी की अगुवाई में नई सरकार ‘सुशासन बाबू’ के सबसे बड़े सामाजिक फैसले को बदल देगी?
सिर्फ कानून नहीं, सामाजिक अभियान
बिहार में शराबबंदी को महज एक सरकारी नीति नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार के बड़े कदम के रूप में देखा गया था। खासकर महिलाओं के बीच इसे व्यापक समर्थन मिला, क्योंकि इसका सीधा असर घरेलू हिंसा और आर्थिक हालात पर पड़ा।
राजस्व बनाम सामाजिक असर की बहस
शराबबंदी के विरोध में सबसे बड़ा तर्क राजस्व नुकसान का दिया जाता है। साथ ही, यह भी कहा जाता है कि प्रतिबंध के बावजूद अवैध रूप से शराब की आपूर्ति जारी है। वहीं समर्थकों का दावा है कि इससे अपराध, घरेलू हिंसा और सड़क हादसों में कमी आई है।
उन्होंने यह भी कहा था कि जैसे चोरी, भ्रष्टाचार या हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं होते, वैसे ही शराबबंदी में चुनौतियां होना स्वाभाविक है—लेकिन इससे कानून की जरूरत खत्म नहीं होती।
सर्वदलीय सहमति से बना था कानून
शराबबंदी लागू करने से पहले सरकार ने सर्वदलीय बैठक, कानूनी राय और जनता की मांग को ध्यान में रखा था। यही वजह है कि इसे व्यापक राजनीतिक समर्थन भी मिला था।
राजनीतिक गणित भी अहम
विश्लेषकों के मुताबिक, शराबबंदी का मुद्दा सिर्फ नीति नहीं, बल्कि राजनीति से भी जुड़ा है।
महिलाओं का बड़ा वोट बैंक इस फैसले से प्रभावित होता है
चुनावी रणनीति में इसका सीधा असर पड़ सकता है
दूसरे राज्यों ने भी दिखाई थी दिलचस्पी
बिहार मॉडल को देखने के लिए अन्य राज्यों ने भी पहल की थी। अशोक गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान से एक टीम और छत्तीसगढ़ से प्रतिनिधिमंडल अध्ययन के लिए बिहार आया था।
आगे क्या?
फिलहाल सरकार की ओर से कोई अंतिम फैसला नहीं आया है, लेकिन जिस तरह से बहस तेज हुई है, उससे साफ है कि आने वाले समय में शराबबंदी बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है।
शराबबंदी को खत्म करना या जारी रखना—यह सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन का सवाल है। अब देखना होगा कि नई सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है।
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