नई दिल्ली। देशभर में महिला आरक्षण (Women Reservation) को लेकर सियासी बहस तेज रही,सड़क से लेकर संसद तक इस मुद्दे ने खूब सुर्खियां बटोरीं। इसी बीच असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया,क्या पार्टियों ने टिकट बांटने में भी महिलाओं को उतनी ही प्राथमिकता दी, जितनी भाषणों में दिखाई?
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के कार्यक्रम के मुताबिक इन चुनावों के नतीजे 4 मई को घोषित होने हैं। हालांकि असम, केरल और पुडुचेरी में मतदान हो चुका है, जबकि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में प्रक्रिया बाकी है।
केरल में मुकाबला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के बीच है। यहां कुल 863 उम्मीदवारों में सिर्फ 92 महिलाएं हैं, यानी करीब 11%।
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने पहली बार एक साथ दो महिला उम्मीदवार उतारकर हल्की पहल जरूर की है।
तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम के नेतृत्व वाली राजनीति के बीच कुल 442 महिला उम्मीदवार मैदान में हैं, जो करीब 14% है।
पिछले चुनावों के मुकाबले यह आंकड़ा बढ़ा है। 2021 में 407 और 2016 में सिर्फ 214 महिलाएं चुनाव लड़ी थीं।
असम में तस्वीर सबसे कमजोर दिखती है। कुल 722 उम्मीदवारों में सिर्फ 60 महिलाएं, यानी महज 8%।
यह तब है जब राज्य की मतदाता सूची में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 50% है। ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट समेत कई दलों ने बेहद सीमित संख्या में महिलाओं को टिकट दिया।
केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 14% है। यहां 40 महिलाएं चुनाव मैदान में हैं, जबकि पुरुष उम्मीदवारों की संख्या 250 से ज्यादा है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने 52 महिलाओं को टिकट दिया है—जो राज्य में सबसे ज्यादा है।
इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (35), लेफ्ट (34) और भारतीय जनता पार्टी (33) का नंबर आता है।
फिर भी कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 11% ही है।
इन पांच राज्यों के आंकड़े साफ बताते हैं कि महिला आरक्षण और सशक्तिकरण पर भले ही राजनीतिक दल खुलकर बात करते हैं, लेकिन टिकट वितरण में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी 10-15% के बीच सिमटी हुई है।
यानी आधी आबादी को लेकर बड़े दावे तो हैं, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
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