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AAP से BJP गए सांसदों पर सियासी घमासान, भगवंत मान ने ‘राइट टू रिकॉल’ मुद्दे को बनाया हथियार

May 01, 2026

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (AAP) से भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए सांसदों को लेकर सियासत तेज हो गई है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान अब इस मुद्दे को राष्ट्रपति तक ले जाने की तैयारी में हैं। बताया जा रहा है कि वह जल्द ही द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर AAP छोड़कर BJP में गए सात राज्यसभा सांसदों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर सकते हैं।

इस पूरे मामले में दिलचस्प बात यह है कि भगवंत मान ने अपनी ही पार्टी के नेता राघव चड्ढा के पुराने बयान को आधार बनाया है, जिसमें उन्होंने ‘राइट टू रिकॉल’ यानी जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार देने की बात कही थी।



  • राष्ट्रपति से क्या मांग कर सकते हैं मान?
    रिपोर्ट्स के अनुसार, भगवंत मान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से अपील करेंगे कि पार्टी बदलने वाले सांसदों की सदस्यता रद्द करने या उन्हें वापस बुलाने के विकल्पों पर विचार किया जाए। उनका तर्क है कि जनता ने इन नेताओं को AAP के टिकट पर चुना था, ऐसे में पार्टी बदलना मतदाताओं के जनादेश के साथ विश्वासघात है।

    क्या कहा था राघव चड्ढा ने?
    इस साल की शुरुआत में राघव चड्ढा ने राज्यसभा में ‘राइट टू रिकॉल’ की जोरदार वकालत की थी। उन्होंने कहा था कि अगर जनता नेताओं को चुन सकती है, तो उन्हें हटाने का अधिकार भी होना चाहिए। चड्ढा ने इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला एक जरूरी कदम बताया था।

    उन्होंने यह भी कहा था कि वर्तमान व्यवस्था में नेता चुनाव जीतने के बाद पांच साल तक जवाबदेही से दूर हो जाते हैं, जिससे जनता के पास उन्हें बीच कार्यकाल में हटाने का कोई विकल्प नहीं रहता।

    कितना संभव है ‘राइट टू रिकॉल’?
    भारत में फिलहाल ‘राइट टू रिकॉल’ की व्यवस्था लागू नहीं है। सांसदों या विधायकों की सदस्यता खत्म करने के लिए संविधान में तय प्रक्रियाएं हैं, जिनमें दल-बदल कानून (एंटी-डिफेक्शन लॉ) भी शामिल है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि भगवंत मान की यह पहल कानूनी रूप से कितना असर डाल पाती है।

    बढ़ सकती है सियासी टकराव
    इस मुद्दे ने AAP और BJP के बीच राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया है। एक ओर AAP इसे जनादेश के सम्मान का सवाल बता रही है, तो वहीं BJP इसे राजनीतिक रणनीति के तौर पर देख सकती है।

    अब नजर इस बात पर रहेगी कि राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद यह मुद्दा किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या ‘राइट टू रिकॉल’ जैसी बहस फिर से राष्ट्रीय स्तर पर जोर पकड़ती है।

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