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अमेरिका की ‘प्रायोरिटी वॉच लिस्ट’ में फिर भारत, IPR नियमों पर उठे सवाल; क्या है असली चिंता?

May 03, 2026

वॉशिंगटन। अमेरिका ने एक बार फिर भारत को बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) से जुड़े मुद्दों पर अपनी ‘प्रायोरिटी वॉच लिस्ट’ में बनाए रखा है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) की 2026 की ‘स्पेशल 301 रिपोर्ट’ में भारत के साथ चीन, रूस, इंडोनेशिया, चिली और वेनेजुएला (China, Russia, Indonesia, Chile and Venezuela) जैसे देशों को भी शामिल किया गया है।


  • ‘प्रायोरिटी वॉच लिस्ट’ क्या होती है?

    हर साल जारी होने वाली इस रिपोर्ट में अमेरिका अपने व्यापारिक साझेदार देशों के पेटेंट, कॉपीराइट और ट्रेडमार्क सुरक्षा के स्तर की समीक्षा करता है।

    • ‘वॉच लिस्ट’ और ‘प्रायोरिटी वॉच लिस्ट’ में शामिल देशों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है
    • इसका मतलब तुरंत प्रतिबंध नहीं, बल्कि व्यापार वार्ता में दबाव बनाना होता है

    भारत पर अमेरिका की मुख्य आपत्तियां

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में IPR सुरक्षा और उसका लागू होना अभी भी “चुनौतीपूर्ण” है। प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं:

    1. पेटेंट कानून और धारा 3(d)
    भारत का पेटेंट कानून, खासकर धारा 3(d), मामूली बदलाव के आधार पर नए पेटेंट देने से रोकता है।

    • अमेरिकी फार्मा कंपनियां इसे अपने नवाचार के खिलाफ मानती हैं
    • भारत इसे सस्ती दवाओं की उपलब्धता के लिए जरूरी मानता है

    2. डेटा सुरक्षा पर सवाल
    अमेरिका को चिंता है कि फार्मा और कृषि रसायनों से जुड़े गोपनीय डेटा की सुरक्षा के लिए भारत में पर्याप्त तंत्र नहीं है।

    3. भारी कस्टम ड्यूटी
    रिपोर्ट में भारत द्वारा लगाए गए उच्च आयात शुल्क की आलोचना की गई है, खासकर:

    • ICT उत्पाद
    • मेडिकल उपकरण
    • सोलर इक्विपमेंट
    • दवाएं

    4. कॉपीराइट और नकली उत्पाद
    कॉपीराइट लागू करने में ढिलाई और बड़े पैमाने पर काउंटरफिट (नकली) सामान की मौजूदगी भी अमेरिका की चिंता बनी हुई है।

    असल ‘डर’ क्या है?

    अमेरिका की मुख्य चिंता उसकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों, खासकर दवा कंपनियों के मुनाफे और पेटेंट अधिकार से जुड़ी है।

    • भारत जनहित में (जैसे सस्ती दवाएं) पेटेंट नियमों में लचीलापन रखता है
    • इससे विदेशी कंपनियों का एकाधिकार सीमित होता है

    अन्य देशों पर भी नजर

    • वियतनाम को ‘प्रायोरिटी फॉरेन कंट्री’ श्रेणी में रखा गया है, जहां कार्रवाई की संभावना है
    • यूरोपीय संघ को ‘वॉच लिस्ट’ में जोड़ा गया
    • अर्जेंटीना को इस बार सूची से बाहर किया गया

    भारत का इस सूची में बने रहना नया नहीं है—1990 के दशक से ही यह स्थिति बनी हुई है। असल में यह कानून बनाम व्यापारिक हित की बहस है, जहां

    • अमेरिका अपनी कंपनियों के हितों की रक्षा चाहता है
    • वहीं भारत सस्ती दवाओं और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देता है

    आने वाले समय में यह मुद्दा भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं में अहम भूमिका निभाता रहेगा।

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