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लंबी उम्र की तकनीकों पर रूस का बड़ा दांव, जीन थेरेपी और कृत्रिम अंगों पर हो रहा शोध

May 30, 2026

मॉस्को। रूस (Russia) में उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने और मानव स्वास्थ्य (human health) को बेहतर बनाने से जुड़ी अत्याधुनिक तकनीकों पर बड़े पैमाने पर शोध किया जा रहा है। इस दिशा में चल रहे एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के तहत जीन थेरेपी, कृत्रिम अंग निर्माण, ऑर्गन प्रिंटिंग और पुनर्जनन चिकित्सा (Regenerative Medicine) जैसी तकनीकों पर काम जारी है।

रूसी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य उम्र संबंधी बीमारियों को कम करना, जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाना और मानव अंगों के प्रत्यारोपण के लिए नए विकल्प विकसित करना है। इस परियोजना पर लगभग 2.48 लाख करोड़ रुपये के बराबर निवेश का अनुमान लगाया गया है, जिसमें सरकारी संस्थानों का भी सहयोग शामिल है।

क्या है ‘न्यू हेल्थ प्रिवेंशन टेक्नोलॉजीज’ कार्यक्रम

‘न्यू हेल्थ प्रिवेंशन टेक्नोलॉजीज’ नामक इस कार्यक्रम के अंतर्गत जीन थेरेपी, ऑर्गन प्रिंटिंग, मिनी-पिग आधारित अंग अनुसंधान और क्रायोथेरेपी जैसी तकनीकों पर अध्ययन किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन तकनीकों से भविष्य में उम्र बढ़ने से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार में नई संभावनाएं खुल सकती हैं।



  • रूसी राष्ट्रपति पुतिन लंबे समय से स्वास्थ्य और फिटनेस को लेकर चर्चा में रहे हैं। हालांकि, उन्हें “अमर बनाने” संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है और विशेषज्ञ इन्हें अटकलों के रूप में देखते हैं।

    पुतिन और शी जिनपिंग की चर्चा फिर सुर्खियों में

    पिछले वर्ष वीजिंग में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान शी जिनपिंग और पुतिन के बीच उम्र और स्वास्थ्य संबंधी बातचीत चर्चा का विषय बनी थी। उस समय सोशल मीडिया पर कई तरह की व्याख्याएं सामने आई थीं, हालांकि बातचीत के संदर्भ को लेकर कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया।

    जीन थेरेपी और अंग प्रत्यारोपण पर फोकस

    रूसी सरकार ने हाल ही में घोषणा की थी कि वैज्ञानिक ऐसी जीन-थेरेपी तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने में मदद कर सकती हैं। रूस के विज्ञान मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, परियोजना का एक प्रमुख लक्ष्य ऐसे जैविक अंग विकसित करना है जिन्हें भविष्य में मानव शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सके।

    परियोजना से जुड़े अनुसंधान समूहों का लक्ष्य वर्ष 2030 तक कृत्रिम और प्रयोगशाला में विकसित अंगों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल करना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह तकनीक सफल होती है तो अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आ सकता है और लाखों मरीजों को लाभ मिल सकता है।

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