
नई दिल्ली । हिंदी फिल्म संगीत (Hindi Film Music) के इतिहास में कुछ गीत ऐसे हैं जो समय के साथ और भी अधिक भावनात्मक और यादगार बन जाते हैं। वर्ष 1968 में रिलीज हुई फिल्म ‘नील कमल (Neel Kamal)’ का प्रसिद्ध विदाई गीत ‘बाबुल की दुआएं लेती जा (Babul Ki Duayen Leti Ja)’ भी उन्हीं अमर गीतों में शामिल है। इस गीत ने न केवल दर्शकों के दिलों में विशेष स्थान बनाया, बल्कि फिल्म की रिलीज से पहले ही उद्योग के कई बड़े कलाकारों को भावुक कर दिया था। इस गीत से जुड़ा एक ऐसा ही किस्सा अभिनेता राजेंद्र कुमार (Rajendra Kumar) से जुड़ा है, जिसे आज भी हिंदी सिनेमा (Hindi Cinema) के सबसे भावुक प्रसंगों में गिना जाता है।
बताया जाता है कि उस दौर में फिल्म ‘नील कमल’ का निर्माण चल रहा था और संगीतकार रवि ने इसके लिए संगीत तैयार किया था। गीतकार साहिर लुधियानवी ने इस फिल्म के लिए ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ जैसे संवेदनशील बोल लिखे, जबकि इसे अपनी भावपूर्ण आवाज से मोहम्मद रफी ने अमर बना दिया। हालांकि उस समय तक फिल्म रिलीज नहीं हुई थी और आम लोगों ने यह गीत नहीं सुना था। इसी बीच प्रसिद्ध गीतकार राजेंद्र कृष्णन की बेटी की शादी का आयोजन हुआ, जिसमें फिल्म जगत की कई नामचीन हस्तियां शामिल हुईं। अभिनेता राजेंद्र कुमार भी इस समारोह में मौजूद थे।
शादी के दौरान राजेंद्र कृष्णन ने संगीतकार रवि से आग्रह किया कि वे कोई विशेष गीत प्रस्तुत करें। रवि ने उनकी बात स्वीकार की, लेकिन यह शर्त रखी कि वह गीत केवल विदाई के समय ही गाएंगे। जब बेटी की विदाई की रस्म शुरू हुई तो माहौल पहले से ही भावुक था। इसी दौरान रवि ने मंच संभाला और ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ गाना गाना शुरू किया। गीत के बोल और उसकी धुन ने वहां मौजूद सभी लोगों को भावुक कर दिया। परिवार के सदस्यों की आंखें नम हो गईं और विदाई का दृश्य और भी मार्मिक बन गया।
इस गीत का प्रभाव इतना गहरा था कि अभिनेता राजेंद्र कुमार अपने आंसू नहीं रोक सके। बताया जाता है कि गीत समाप्त होने के बाद वे सीधे संगीतकार रवि के पास पहुंचे और भावुक होकर पूछा कि यह गाना आखिर किस फिल्म का है। उस समय तक ‘नील कमल’ रिलीज नहीं हुई थी, इसलिए रवि ने उन्हें गीत और फिल्म के बारे में विस्तार से जानकारी दी। यह घटना इस बात का प्रमाण मानी जाती है कि एक सशक्त गीत अपनी रिलीज से पहले भी लोगों के दिलों तक पहुंच सकता है।
इस गीत से जुड़ा एक और भावुक पहलू मोहम्मद रफी से भी जुड़ा है। कहा जाता है कि रिकॉर्डिंग के दौरान रफी साहब अपनी बेटी की सगाई को याद कर भावुक हो गए थे। जब वे विदाई के भावों को आवाज दे रहे थे, तब उनकी आवाज एक स्थान पर भारी हो गई थी। संगीतकार रवि ने उस भावनात्मक क्षण को गीत में बरकरार रखा, क्योंकि उन्हें लगा कि एक पिता के दर्द की वास्तविक अनुभूति गीत को और अधिक प्रभावशाली बना रही है। यही कारण है कि यह गीत आज भी भारतीय शादियों और विदाई समारोहों का अहम हिस्सा बना हुआ है।
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