
नई दिल्ली ।राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 9 (Class 9) की कला शिक्षा पुस्तक में प्रकाशित सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) की प्रसिद्ध ‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा (Dancing Girl Statue) की तस्वीर को लेकर शुरू हुआ विवाद अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। आलोचनाओं और विशेषज्ञों की आपत्तियों के बाद परिषद ने संकेत दिया है कि आगामी संस्करणों में प्रतिमा की मूल तस्वीर ही प्रकाशित की जाएगी। इस निर्णय ने शिक्षा, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage) की प्रस्तुति को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब कक्षा 9 की कला शिक्षा पुस्तक ‘मधुरिमा’ में मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा ‘डांसिंग गर्ल’ की एक संशोधित तस्वीर प्रकाशित की गई। पुस्तक में प्रतिमा के ऊपरी हिस्से को इस प्रकार प्रदर्शित किया गया था कि उसका मूल स्वरूप पूरी तरह दिखाई नहीं देता था। इतिहासकारों, शिक्षाविदों और कला विशेषज्ञों ने इस बदलाव पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे ऐतिहासिक धरोहर की वास्तविक प्रस्तुति प्रभावित होती है।
NCERT के निदेशक दिनेश सकलानी ने इस विषय पर पूछे गए प्रश्न के जवाब में मूल तस्वीर प्रकाशित करने पर सहमति व्यक्त की। इसके बाद यह स्पष्ट संकेत मिला कि संस्था इस विषय पर उठी चिंताओं को गंभीरता से ले रही है। शिक्षा जगत में इस फैसले को ऐतिहासिक सटीकता बनाए रखने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ‘डांसिंग गर्ल’ केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि सिंधु घाटी सभ्यता की कलात्मक उपलब्धियों और तकनीकी दक्षता का प्रतीक है। लगभग 2600 ईसा पूर्व की मानी जाने वाली यह कांस्य प्रतिमा मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई थी और इसे प्राचीन भारतीय कला की उत्कृष्ट कृतियों में शामिल किया जाता है। करीब 11 सेंटीमीटर ऊंची यह प्रतिमा एक युवती को आत्मविश्वासपूर्ण मुद्रा में दर्शाती है, जिसकी एक भुजा कमर पर टिकी हुई है और दूसरी नीचे की ओर है। उसकी मुद्रा और शिल्पकला आज भी शोधकर्ताओं को आकर्षित करती है।
इतिहास और पुरातत्व के जानकारों ने तर्क दिया कि किसी भी ऐतिहासिक कलाकृति की तस्वीर में बिना स्पष्ट कारण बदलाव करना उसके मूल स्वरूप और ऐतिहासिक महत्व को प्रभावित कर सकता है। उनका मानना है कि विद्यार्थियों को वास्तविक कलाकृतियों से परिचित कराना शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य होना चाहिए। कई विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि पाठ्यपुस्तकों में इतिहास को यथासंभव प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
विवाद के दौरान यह भी चर्चा में आया कि कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में इसी प्रतिमा का स्वरूप मूल तस्वीर के अधिक निकट दिखाया गया था। इससे अलग-अलग कक्षाओं की पुस्तकों में एक ही ऐतिहासिक धरोहर की भिन्न प्रस्तुति को लेकर प्रश्न उठे। आलोचकों का कहना था कि ऐसी असंगति विद्यार्थियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।
‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा का महत्व केवल उसके कलात्मक स्वरूप तक सीमित नहीं है। इसे ‘लॉस्ट-वैक्स तकनीक’ से निर्मित माना जाता है, जो प्राचीन धातुकला की उन्नत तकनीक का उदाहरण है। यह तकनीक आज भी देश के कुछ हिस्सों में पारंपरिक रूप से उपयोग में लाई जाती है। यही कारण है कि यह प्रतिमा भारतीय पुरातात्विक विरासत की सबसे पहचान योग्य वस्तुओं में गिनी जाती है।
NCERT के हालिया रुख के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि पाठ्यपुस्तकों में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को उनके मूल स्वरूप में प्रस्तुत करने पर अधिक ध्यान दिया जाएगा। यह मामला केवल एक तस्वीर के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा में ऐतिहासिक सटीकता, सांस्कृतिक विरासत और अकादमिक स्वतंत्रता के व्यापक विमर्श का हिस्सा बन चुका है।
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