वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान (US and Iran) के बीच लंबे समय से जारी संघर्ष आखिरकार समाप्त हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (Masood Pejeshkian) ने गुरुवार को शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। 100 दिनों से अधिक समय तक चले तनाव और तबाही के बाद हुए इस समझौते को वैश्विक स्तर पर राहत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) के लिए यह समझौता राजनीतिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर नई चुनौतियां लेकर आया है।
चुनावी साल में बढ़ा दबाव
इजरायल में इस वर्ष अक्टूबर के अंत तक आम चुनाव होने हैं। ऐसे समय में अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते ने नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति को कठिन बना दिया है। विपक्षी दल लगातार उन पर निशाना साध रहे हैं। विपक्ष के प्रमुख नेता यायर लैपिड ने संसद में कहा कि प्रधानमंत्री ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां उन्हें या तो अमेरिका जैसे सबसे बड़े सहयोगी के साथ टकराव मोल लेना होगा या फिर इजरायल के हितों से समझौता करना पड़ेगा।
नेतन्याहू को केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि उनकी गठबंधन सरकार में शामिल दक्षिणपंथी सहयोगियों के विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है। कट्टरपंथी नेता और मंत्री उस समझौते से नाराज हैं, जो इजरायल की सैन्य कार्रवाई की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है।
जानकारी के अनुसार, अमेरिका-ईरान समझौते में ईरान ने लेबनान समेत अन्य मोर्चों पर सैन्य गतिविधियां रोकने की शर्त रखी है, जिसे अमेरिका ने स्वीकार कर लिया। इस फैसले को लेकर इजरायल के दक्षिणपंथी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने सोशल मीडिया पर कहा कि ट्रंप और ईरान के बीच हुआ समझौता इजरायल पर लागू नहीं होता। उनके अनुसार यह समझौता देश की सुरक्षा की गारंटी नहीं देता और इजरायल इसके लिए बाध्य नहीं है।
भ्रष्टाचार केस ने बढ़ाई परेशानी
राजनीतिक मोर्चे पर बढ़ते दबाव के बीच नेतन्याहू पहले से ही भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों का सामना कर रहे हैं। इन कानूनी चुनौतियों ने उनकी स्थिति को और अधिक कमजोर बना दिया है। ऐसे में अमेरिका-ईरान समझौता उनके लिए अतिरिक्त राजनीतिक संकट बनकर उभरा है।
ट्रंप से भी नहीं मिल रहा समर्थन
विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू को सबसे बड़ा झटका अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख से लगा है। रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान को लेकर दोनों नेताओं के बीच पिछले कुछ समय से मतभेद बने हुए थे। नेतन्याहू युद्ध जारी रखकर देश में “पूर्ण विजय” की छवि पेश करना चाहते थे, जिससे आगामी चुनावों में उन्हें फायदा मिल सकता था।
लेकिन ट्रंप ने युद्ध खत्म कराने और समझौते को प्राथमिकता देकर नेतन्याहू की रणनीति को झटका दिया। हाल के दिनों में दोनों नेताओं के रिश्तों में तनाव की खबरें भी सामने आई हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ट्रंप के इस कदम ने नेतन्याहू की घरेलू राजनीति को और जटिल बना दिया है।
बढ़ती चुनौतियों के बीच मुश्किल राह
अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते को जहां दुनिया शांति की दिशा में बड़ा कदम मान रही है, वहीं नेतन्याहू के लिए यह राजनीतिक संकट का कारण बन गया है। विपक्ष के हमले, सहयोगियों की नाराजगी, कानूनी विवाद और अमेरिका के बदले रुख ने उन्हें ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जहां आगामी चुनाव से पहले हर फैसला उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाला है।
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