
डेस्क: रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पीएफ राशि को लेकर एक कर्मचारी और EPFO के बीच शुरू हुआ विवाद आखिरकार अदालत पहुंच गया. ईपीएपओ ने एक कार्मचारी से पीएफ के 2.5 करोड़ रुपये लौटाने की मांग की, जिसके बाद वह कोर्ट चला गया. इस पर तेलंगाना हाई कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि EPFO किसी कर्मचारी से उसका प्राप्त PF वापस नहीं मांग सकता, भले ही भुगतान नियमों के उल्लंघन में हुआ हो. कोर्ट ने साफ किया कि अगर कोई गड़बड़ी हुई है तो उसकी जिम्मेदारी कंपनी और उसके PF ट्रस्ट की है, न कि कर्मचारी की. यह फैसला लाखों कर्मचारियों के लिए अहम माना जा रहा है.
यह मामला रिटायर्ड कर्मचारी जे.वी. नृपेंद्र राव से जुड़ा है, जो वर्ष 2023 में सेवानिवृत्त हुए थे. रिटायरमेंट के समय उन्हें उनकी कंपनी के PF ट्रस्ट से 2.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था. इसके अलावा करीब 70 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि भी उन्हें मिलनी थी, लेकिन वह रकम YES बैंक के बॉन्ड में फंसी होने के कारण जारी नहीं हो सकी.
मामले के अनुसार, संबंधित कंपनी पहले EPFO के तहत एक एक्सेम्प्टेड ट्रस्ट के रूप में काम कर रही थी. कंपनी ने 1 मार्च 2023 को अपना एक्सेम्प्ट ट्रस्ट स्टेटस छोड़ दिया. इसके बाद 21 जुलाई 2023 को कंपनी ने नृपेंद्र राव को 2.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया. यहीं से विवाद शुरू हुआ. EPFO का कहना था कि एक बार एक्सेम्प्ट स्टेटस खत्म होने के बाद कंपनी के ट्रस्ट को कर्मचारियों को सीधे भुगतान करने का अधिकार नहीं था. नियमों के मुताबिक पूरी राशि EPFO को ट्रांसफर की जानी चाहिए थी.
करीब डेढ़ साल बाद 17 फरवरी 2025 को EPFO ने राव को रिकवरी नोटिस जारी कर दिया. नोटिस में उनसे सात दिनों के भीतर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 2.5 करोड़ रुपये वापस जमा कराने को कहा गया. EPFO का तर्क था कि कंपनी के ट्रस्ट ने एक्सेम्प्शन खत्म होने के बाद भुगतान किया, जो EPF कानून और स्कीम के प्रावधानों के खिलाफ था. इसलिए कर्मचारी को मिली राशि वापस ली जानी चाहिए.
रिकवरी नोटिस मिलने के बाद राव ने तेलंगाना हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की. उन्होंने कहा कि यह पैसा उनके अपने PF योगदान का हिस्सा है और उस पर उनका कानूनी अधिकार है. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि EPFO ने बिना कोई कारण बताओ नोटिस जारी किए और बिना सुनवाई का अवसर दिए सीधे रिकवरी नोटिस भेज दिया, जो नेचुरल जस्टिस के सिद्धांतों के खिलाफ है. राव ने अदालत को यह भी बताया कि उन्हें अभी तक 70 लाख रुपये की शेष राशि भी नहीं मिली है, जो YES बैंक बॉन्ड में फंसी हुई है.
सुनवाई के दौरान EPFO ने अदालत को बताया कि EPF स्कीम, 1952 के पैराग्राफ 28(1)(ii) के अनुसार एक्सेम्प्शन खत्म होने पर ट्रस्ट को पूरी राशि EPFO को ट्रांसफर करनी होती है. लेकिन कंपनी ने ऐसा करने के बजाय कर्मचारी को भुगतान कर दिया. हालांकि अदालत ने कहा कि अगर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी कंपनी और उसके PF ट्रस्ट की बनती है. कर्मचारी को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
लाइव-लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस नागेश भीमपाका ने कहा कि EPFO कोई ऐसा कानूनी प्रावधान नहीं बता पाया जिसके तहत किसी कर्मचारी से PF की रकम वसूल की जा सके. अदालत ने यह भी कहा कि कर्मचारी के खिलाफ धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने या मिलीभगत का कोई आरोप नहीं है. कोर्ट ने माना कि रिकवरी नोटिस जारी करने से पहले न तो कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया गया. इसलिए यह कार्रवाई नेचुरल जस्टिस के सिद्धांतों के खिलाफ है.
हाई कोर्ट ने EPFO की रिकवरी नोटिस को रद्द कर दिया, लेकिन यह भी साफ किया कि अगर कंपनी या उसके PF ट्रस्ट ने EPF कानून का उल्लंघन किया है तो EPFO उनके खिलाफ अलग से कानूनी कार्रवाई कर सकता है. कोर्ट ने कहा कि EPF Act एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा देना है. ऐसे में नियोक्ता और ट्रस्ट की जिम्मेदारियों का बोझ कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता. यह फैसला उन लाखों कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो अपने रिटायरमेंट फंड की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं. अदालत ने साफ कर दिया कि किसी प्रशासनिक या कानूनी चूक की कीमत कर्मचारी से नहीं वसूली जा सकती.
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