मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति (In Maharashtra politics) में एक बार फिर शिवसेना (UBT के भीतर असंतोष की चर्चा तेज हो गई है। पार्टी के छह लोकसभा सांसदों (Lok Sabha MPs) के कथित तौर पर अलग राह पकड़ने की अटकलों ने उद्धव ठाकरे खेमे की चिंता बढ़ा दी है। दिलचस्प बात यह है कि इस राजनीतिक उथल-पुथल की जड़ें किसी हालिया विवाद में नहीं, बल्कि करीब दो दशक पुराने एक चर्चित हत्याकांड और उससे जुड़े अदालती फैसले में बताई जा रही हैं।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, धाराशिव से सांसद ओमराजे निंबालकर समेत छह सांसदों के शिंदे गुट के प्रति नरम रुख अपनाने की चर्चाएं उस समय तेज हुईं, जब वे शिवसेना (यूबीटी) के 60वें स्थापना दिवस कार्यक्रम से दूर रहे। इसके बाद पार्टी नेतृत्व ने बागी तेवर दिखाने वाले नेताओं पर सख्त रुख अपनाने के संकेत दिए।
विवाद के केंद्र में 2006 का चर्चित पवनराजे निंबालकर हत्याकांड है। कांग्रेस नेता पवनराजे निंबालकर और उनके ड्राइवर की 3 जून 2006 को नवी मुंबई के कलंबोली इलाके में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री पदमसिंह पाटिल समेत कई लोगों को आरोपी बनाया गया था।
यह मामला लंबे समय से मराठवाड़ा की राजनीति का अहम मुद्दा रहा है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और स्थानीय सत्ता संघर्ष को लेकर दोनों परिवारों के बीच टकराव की चर्चा वर्षों से होती रही है।
हाल ही में विशेष सीबीआई अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। फैसले के बाद राजनीतिक माहौल अचानक गरमा गया। इससे पहले शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने आरोप लगाया था कि पार्टी के सांसदों को तोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं और उन्हें विभिन्न प्रकार के प्रलोभन दिए जा रहे हैं।
राउत ने यह भी दावा किया था कि कुछ नेताओं को राजनीतिक लाभ और कानूनी मामलों में राहत के संकेत देकर पाला बदलने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
बगावत की अटकलों के बीच सांसद ओमराजे निंबालकर ने कहा कि उनकी राजनीति की शुरुआत ही अपने पिता को न्याय दिलाने की लड़ाई से हुई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष व्यक्तिगत स्वार्थ या किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए है।
अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सभी आरोपी बरी हो गए हैं, तो उनके पिता की हत्या किसने की। उन्होंने कहा कि फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी और न्याय मिलने तक संघर्ष जारी रहेगा।
दूसरी ओर, शिवसेना (यूबीटी) नेतृत्व ने भी सख्ती दिखानी शुरू कर दी है। पार्टी के मुख्य सचेतक अनिल देसाई ने स्थापना दिवस कार्यक्रम और महत्वपूर्ण बैठकों से अनुपस्थित रहने वाले सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। उनसे 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो दलबदल विरोधी कानून के तहत आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।
फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि असंतुष्ट सांसद पार्टी में बने रहते हैं या नया राजनीतिक रास्ता चुनते हैं। लेकिन इतना तय है कि 20 साल पुराने हत्याकांड पर आए फैसले ने शिवसेना (यूबीटी) के भीतर चल रहे असंतोष को खुलकर सामने ला दिया है और महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरणों की संभावनाएं बढ़ा दी हैं।
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