
नई दिल्ली: किसी मरीज के लिए सही समय पर मिलने वाला अंग जिंदगी की नई उम्मीद बन सकता है. ऐसा ही एक मामला दिल्ली के AIIMS में सामने आया, जहां चंडीगढ़ से सेना के हेलीकॉप्टर के जरिए दो किडनी दिल्ली लाई गईं और 56 वर्षीय महिला में दोनों किडनी का सफल ट्रांसप्लांट किया गया. खास बात यह है कि ये किडनी 70 साल की महिला डोनर से मिली थीं और दोनों को एक ही मरीज में ट्रांसप्लान्ट किया गया. AIIMS के मुताबिक, यह किसी मार्जिनल डोनर से किया गया उसका दूसरा डुअल किडनी ट्रांसप्लांट है.
यह अंग चंडीगढ़ के कमांड अस्पताल से मिले थे. डोनर की उम्र 70 साल होने की वजह से दोनों किडनी को सामान्य तरीके से इस्तेमाल करने के बजाय डॉक्टरों ने एक खास रणनीति अपनाई. दोनों किडनी को एक ही मरीज में लगाने का फैसला किया गया, ताकि उपलब्ध अंगों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग हो सके. इन किडनियों को चंडीगढ़ से नई दिल्ली तक सेना के हेलीकॉप्टर से तेजी से और सुरक्षित तरीके से पहुंचाया गया. अंगों को करीब 12 घंटे तक कोल्ड इस्कीमिया टाइम का सामना करना पड़ा. इसके बावजूद ट्रांसप्लांट के तुरंत बाद दोनों किडनी ने काम करना शुरू कर दिया.
जिस महिला का ट्रांसप्लांट किया गया, उनकी उम्र 56 साल थी. डॉक्टरों ने दोनों किडनी को उनके शरीर के दाहिने हिस्से में ट्रांसप्लान्ट किया. सर्जरी के बाद उनकी हालत में कोई बड़ी परेशानी नहीं आई और किडनी सामान्य रूप से काम करती रही. करीब 10 दिन बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.
यह पूरा ट्रांसप्लांट AIIMS के सर्जरी, नेफ्रोलॉजी, एनेस्थीसिया और ट्रांसप्लांट इम्यूनोलॉजी विभागों के साथ ORBO की टीम के सहयोग से हुआ. आर्मी रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल, नई दिल्ली ने भी इसमें सहयोग किया. अंगों को समय पर दिल्ली पहुंचाने में सेना के हेलीकॉप्टर की अहम भूमिका रही. AIIMS के निदेशक प्रो निखिल टंडन के मार्गदर्शन में पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया गया. ORBO के ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर बलराम ने अंगों की व्यवस्था, परिवहन और ट्रांसप्लांट के बीच बेहतर तालमेल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
सर्जरी की टीम का नेतृत्व प्रो असुरि कृष्णा समेत डॉक्टरों की टीम ने किया, जबकि नेफ्रोलॉजी टीम में प्रो भौमिक, प्रो महाजन और डॉ सचिन शामिल रहे. एनेस्थीसिया की जिम्मेदारी विभागाध्यक्ष प्रो विमी रेवाड़ी के नेतृत्व में डॉ हेना और उनकी टीम ने संभाली.
मार्जिनल डोनर से मिलने वाले अंगों का इस्तेमाल कई बार उम्र या दूसरी वजहों से चुनौतीपूर्ण माना जाता है. ऐसे मामलों में दोनों किडनी को एक ही मरीज में ट्रांसप्लांट करने से पर्याप्त किडनी फंक्शन हासिल किया जा सकता है. AIIMS की यह सफलता ऐसे अंगों के इस्तेमाल का रास्ता खोलती है, जिन्हें पहले कम उपयोगी मानकर छोड़ दिया जाता था. इससे गंभीर किडनी बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए ट्रांसप्लांट के ज्यादा मौके बन सकते हैं.
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