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दुनिया की इकलौती जगह, जहां महिलाएं और पुरुष बोलते हैं अलग बोलियां

June 26, 2026

डेस्क: सोशल मीडिया पर अक्सर अजीबोगरीब खबरें वायरल होती रहती हैं, लेकिन आज हम आपको एक ऐसी दिलचस्प जगह के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में जानकर आप सच में हैरान रह जाएंगे. यहां बात हो रही है दुनिया के इकलौते ऐसे कस्बे की, जहां एक ही छत के नीचे रहने वाले पति-पत्नी दो अलग-अलग भाषाओं में बात करते हैं.

यह हैरान करने वाला मामला साउथ नाइजीरिया के क्रॉस रिवर राज्य में स्थित ‘उबांग’ (Ubang) नाम के एक छोटे से कस्बे का है. यहां के बाशिंदे सदियों से एक बेहद अनोखी परंपरा निभाते आ रहे हैं. इस जगह पर पुरुष और महिलाएं एक ही चीज को पुकारने के लिए पूरी तरह से अलग शब्दों और बोलियों का इस्तेमाल करते हैं. दिलचस्प बात यह है कि इन शब्दों की सिर्फ टोन या उच्चारण अलग नहीं होता, बल्कि इनका आपस में अक्षरों का भी कोई लेना-देना नहीं होता. ये पूरी तरह से दो अलग भाषाएं हैं.

जाहिर है अब आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि अगर भाषाएं इतनी अलग हैं, तो ये आपस में बातचीत कैसे करते हैं? दरअसल, अलग बोलने के बावजूद यहां के पुरुष और महिलाएं एक-दूसरे की भाषा को बहुत आसानी से समझ लेते हैं. बचपन से ही दोनों भाषाओं को सुनते रहने के कारण इन्हें दोनों बोलियों की पूरी समझ होती है. जहां पुरुष कपड़े को ‘नकी’ कहते हैं, वहीं महिलाएं इसके लिए ‘अरिगा’ शब्द का इस्तेमाल करती हैं. पुरुषों के लिए पेड़ का मतलब ‘किट्ची’ होता है, जबकि महिलाएं इसे ‘ओक्वेंग’ कहती हैं.


  • उबांग में जब भी कोई बच्चा पैदा होता है, चाहे वह लड़का हो या लड़की, वह सबसे पहले महिलाओं की भाषा (Araseke) बोलना ही सीखता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बचपन में बच्चे अपना ज्यादातर समय अपनी मां और घर की अन्य महिलाओं के साथ बिताते हैं. जब लड़का लगभग 10 साल का होता है, तो वह धीरे-धीरे महिलाओं वाले शब्दों को छोड़ देता है और पुरुषों की भाषा अपना लेता है. हालांकि, अगर कोई लड़का एक तय उम्र के बाद पुरुषों की भाषा बोलना शुरू नहीं करता, तो उसे समाज में सामान्य नहीं माना जाता.

    यहां के बुजुर्ग इस अनोखी परंपरा को पूरी तरह से आध्यात्मिक मानते हैं. स्थानीय लोक-कथाओं के अनुसार, जब ईश्वर पूरी दुनिया में भाषाएं बांट रहे थे, तो उन्होंने सबसे पहले उबांग कस्बे से शुरुआत की. उन्होंने इस जगह को दो अलग-अलग भाषाएं दे दीं. लेकिन बाद में उन्हें एहसास हुआ कि अगर वे हर जगह ऐसा करेंगे, तो बाकी दुनिया के लिए भाषाएं कम पड़ जाएंगी. इसलिए वे आगे रुक गए, और इस तरह उबांग के हिस्से में यह अनोखा वरदान हमेशा के लिए रह गया. आज भी यहां के लोग इसे भगवान का एक खास आशीर्वाद मानते हैं.

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