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बिना पैरों के भी कैसे फुर्ती से चलते हैं सांप, करोड़ों वर्षों के विकासक्रम ने छिपाया यह अनोखा रहस्य

July 27, 2026


नई दिल्ली । धरती (Earth) पर पाए जाने वाले जीवों में सांप (Snake) अपनी अनोखी शारीरिक बनावट और बिना पैरों के तेज़ी से चलने की क्षमता के कारण हमेशा लोगों की जिज्ञासा का विषय रहे हैं। अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर सांपों के पैर क्यों नहीं होते और वे बिना पैरों के इतनी आसानी से कैसे आगे बढ़ते हैं। वैज्ञानिक (Scientists) शोध बताते हैं कि सांप हमेशा से बिना पैरों के नहीं थे, बल्कि करोड़ों वर्षों तक चले विकासक्रम (Evolution) के दौरान उनके पैर धीरे-धीरे समाप्त हो गए।

जीवविज्ञान के अनुसार किसी भी जीव के शरीर में होने वाले परिवर्तन उसके वातावरण और जीवनशैली के अनुरूप विकसित होते हैं। जैसे पक्षियों में उड़ने के लिए पंख विकसित हुए और व्हेल में तैरने के लिए फ्लिपर बने, उसी तरह सांपों का शरीर भी समय के साथ विशेष परिस्थितियों के अनुसार बदलता गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि लंबा, पतला और बिना पैरों वाला शरीर सांपों के लिए अधिक उपयोगी साबित हुआ, जिससे वे अलग-अलग वातावरण में आसानी से जीवित रह सके।

सांपों के पैरों के समाप्त होने को लेकर वैज्ञानिकों के बीच दो प्रमुख सिद्धांत प्रचलित हैं। पहला सिद्धांत यह कहता है कि शुरुआती सांप जमीन के नीचे बिलों में रहने लगे थे। संकरी सुरंगों और तंग स्थानों में चार पैर उनकी गति में बाधा बनते थे। धीरे-धीरे प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया के कारण ऐसे सांप अधिक सफल हुए जिनके पैर छोटे होते गए और अंततः पूरी तरह समाप्त हो गए।

दूसरा सिद्धांत समुद्री जीवन से जुड़ा है। इसके अनुसार सांपों के पूर्वज लंबे समय तक समुद्री वातावरण में रहे, जहां तैरने के लिए पैरों की आवश्यकता कम थी। समय के साथ उनका शरीर पानी में आसानी से आगे बढ़ने के अनुकूल बन गया और पैरों का महत्व समाप्त होता चला गया। हालांकि दोनों सिद्धांत अलग-अलग हैं, लेकिन वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि बिना पैरों वाला लंबा शरीर सांपों के अस्तित्व के लिए लाभदायक साबित हुआ।

जीवाश्मों से भी इस विकासक्रम के महत्वपूर्ण प्रमाण मिले हैं। लगभग 9.2 करोड़ वर्ष पुराने ‘नजाश रियोनेग्रिना’ नामक सांप के जीवाश्म में शरीर के पिछले हिस्से पर छोटे-छोटे पैर पाए गए थे। ये पैर इतने छोटे थे कि उनसे चलना संभव नहीं था। माना जाता है कि उनका उपयोग संभवतः प्रजनन के दौरान संतुलन या पकड़ बनाने के लिए होता होगा।

इसके बाद लगभग 8.5 करोड़ वर्ष पुराने ‘डिनिलिसिया पैटागोनिका’ के जीवाश्म में पैरों का पूरी तरह अभाव मिला। वैज्ञानिकों के अनुसार यह उन शुरुआती सांपों में शामिल था जिनके शरीर से पैर पूरी तरह समाप्त हो चुके थे। इसके कंकाल में कंधे और श्रोणि जैसी संरचनाएं भी नहीं थीं, जो पैरों को सहारा देने के लिए आवश्यक होती हैं।

आज के सांप बिना पैरों के भी अपनी मजबूत मांसपेशियों, लचीली रीढ़ और पेट के नीचे मौजूद विशेष शल्कों की सहायता से आगे बढ़ते हैं। वे शरीर को लहरदार तरीके से मोड़ते हुए जमीन, चट्टानों, पेड़ों और यहां तक कि पानी में भी प्रभावी ढंग से गति कर सकते हैं। यही विशेष संरचना उन्हें शिकार करने, खतरे से बचने और विभिन्न प्रकार के वातावरण में आसानी से रहने में मदद करती है।


  • हालांकि वैज्ञानिकों ने सांपों के विकासक्रम को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाई हैं, फिर भी उनके पैरों के पूरी तरह समाप्त होने का सटीक कारण अभी भी शोध का विषय बना हुआ है। नए जीवाश्मों और आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों से भविष्य में इस रहस्य के और भी स्पष्ट उत्तर मिलने की संभावना है।

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