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अल्ट्रा क्लीन का डर्टी गेम: बदनामी में अव्वल फिर भी अफसरों की पहली पसंद

July 01, 2026

  • स्वच्छता अभियान को पलीता, अमले को नहीं दी 2 महीने से सैलरी, ननि के अधिकारी कार्रवाई करने से बच रहे

जबलपुर। नगर निगम में आउटसोर्सिंग के जरिए कर्मचारी उपलब्ध कराने वाली अल्ट्रा क्लीन कंपनी का अनुबंध 21 जून को समाप्त हो चुका है। इसके बावजूद कंपनी न केवल पुन: ठेका हासिल करने की जुगत में लगी है बल्कि उसने अपने कर्मचारियों को पिछले 2 महीनों से वेतन भी नहीं दिया है। भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोपों में घिरी इस कंपनी के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में भी औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई है, जिस पर जल्द ही कार्रवाई अपेक्षित है। इस बीच, वेतन न मिलने से आक्रोशित कर्मचारियों ने मंगलवार को सड़क पर कचरा फेंककर अपना विरोध दर्ज कराया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नगर निगम प्रशासन ने कंपनी को नोटिस जारी कर 3 दिनों के भीतर जवाब मांगा है। यह मामला अब बेहद पेचीदा हो गया है, क्योंकि सफाई व्यवस्था ठप होने से शहर का स्वच्छता अभियान प्रभावित हो रहा है।


  • कर्मचारियों के शोषण और वेतन भुगतान पर खामोशी
    अल्ट्रा क्लीन कंपनी लंबे समय से विवादों में रही है और अब कर्मचारियों के आर्थिक संकट ने इसे और गहरा कर दिया है। आरोपों के अनुसार कंपनी के सुपरवाइजर सौरभ गावकर और विकारा रजक की मिलीभगत से पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, खुलासा किया गया है कि कर्मचारियों को 12500 रुपए दिए जाने चाहिए थे, लेकिन उन्हें केवल 9300 रुपए ही दिए जा रहे थे। कंपनी के संचालक मुकेश कालवे से जब इस विषय में संपर्क करने की कोशिश की गई तो उनसे सम्पर्क नहीं हो सका। ठेका समाप्त होने के बाद भी कंपनी कर्मचारियों से लगातार काम करवा रही है, लेकिन वेतन के नाम पर उन्हें केवल आश्वासन मिल रहे हैं।

    अधिकारियों की रहस्यमय चुप्पी, कमीशन का खेल
    इस पूरे प्रकरण में नगर निगम के अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। कंपनी द्वारा बार-बार धांधली किए जाने और वेतन न देने के बावजूद अधिकारियों का इस कदर शांत बने रहना कई प्रकार के संदेह पैदा कर रहा है। ऐसी चर्चाएं जोरों पर हैं कि निगम के कई अधिकारी अंदरखाने इस कंपनी को फिर से टेंडर दिलाने की फिराक में हैं ताकि कमीशन का खेल निरंतर जारी रह सके। सफाई व्यवस्था के चरमराने और कर्मचारियों के सड़कों पर उतरने के बाद भी निगम प्रशासन द्वारा कोई ठोस कार्रवाई न करना प्रशासनिक शिथिलता को दर्शाता है। इससे निगम की छवि धूमिल हो रही है और शहर के नागरिक गंदगी के बीच रहने को मजबूर हैं।

    किसकी शह पर की जा रही मुरव्वत
    सफाई व्यवस्था की बागडोर संभालने वाली कंपनी की लापरवाही ने स्वच्छता अभियान को पलीता लगा दिया है। जब कंपनी ने वेतन देना बंद किया, तो कर्मचारियों ने काम करना छोड़ दिया, जिसका असर सड़कों पर दिखने लगा है। यह एक अत्यंत गंभीर विषय है क्योंकि सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के कारण हर तरफ कचरे के ढेर लग गए हैं। एक तरफ जहां कंपनी दोबारा ठेका पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ जनप्रनिधि और कर्मचारी इस कंपनी के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए हुए हैं। अब देखना यह है कि क्या निगम प्रशासन 3 दिन में कंपनी से कोई सार्थक जवाब ले पाता है या फिर यह भ्रष्टाचार का खेल इसी तरह जारी रहेगा।

     

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