
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल (West Bengal) में तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) में टूट के बाद अचानक अस्तित्व में आया राजनीतिक दल ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (‘Nationalist Citizens Party of India’) एनडीए का सबसे बड़ा घटक बन गया। आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि देश में हर दस दिन में एक राजनीतिक पार्टी बन रही है। भारत के निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार देश में हर महीने तीन से अधिक राजनीतिक दलों का गठन हो रहा। वर्ष 2026 में अब तक 21 राजनीतिक दलों ने अपना पंजीकरण कराने के लिए निर्वाचन आयोग में अर्जी दाखिल की है।
आंकड़ों के अनुसार निर्वाचन आयोग ने पिछले साल 345 गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत राजनीतिक दल के पंजीकरण को खत्म कर दिया। आयोग ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि ये दल पिछले छह साल से न तो कोई चुनाव लड़ रहे थे और न ही अपना कोई लेखाजोखा दे रहे थे। देश में अब 2500 गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल बचे हैं। देश में 2500 से अधिक राजनीतिक दल पंजीकृत हैं, जो आमतौर पर कागजों में गुमनाम रहते हैं और कई बार बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में बड़े दलों के लिए सियासी मोहरे की तरह काम करते हैं।
एनसीपीआई जो सालों से गुमनाम थी। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद हुए महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा की अगुवाई वाली ‘एनडीए’ की सबसे बड़ी घटक बन गई। तृणमूल के बागी 20 सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने के बाद एनडीए को अपना समर्थन दे दिया। इससे पहले इस पार्टी के एक भी सांसद या विधायक नहीं थे। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जून 2026 तक 21 नवगठित दलों ने पंजीकरण के लिए निर्वाचन आयोग के समक्ष अर्जी दाखिल की है। जबकि 2025 में 36 राजनीतिक दलों ने निर्वाचन आयोग में अपना पंजीकरण कराया। हालांकि वर्ष 2024 में कुल 148 नए राजीनितक दलों का गठन हुआ। इनमें से करीब 100 दलों का गठन लोकसभा चुनाव से पहले हुआ।
छोटे दलों को मोहरे की तरह करते हैं इस्तेमाल
देश में करीब 2500 से अधिक गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल हैं और इनमें से अधिकांश गुमनाम है। लेकिन चुनाव के समय में कागजों पर गुमानम में पड़े इन राजनीतिक दलों का बड़े राजनीतिक दल फायदा उठाते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो अक्सर चुनाव में बड़ी राजनीतिक पार्टियां इन छोटे-छोटे दलों को इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, चुनाव में बड़े राजनीतिक दल इन छोटे-छोटे दलों का इस्तेमाल अपने पसंद का उम्मीदवार खड़ा करके विरोधी दलों के वोट काटने या इन दलों के उम्मीदवारों के नाम पर आवंटित वाहनों का इस्तेमाल करते हैं।
चंदे का खेल
देश में हर महीने तीन से अधिक राजनीतिक दलों बन रहे हैं, राजनीतिक पार्टियों की बढ़ती संख्या के बीच कई बार छोटे दलों पर काले धन को सफेद करने के भी आरोप लगते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की रकम पूरी तरह से आयकर से छूट होती है और 2000 रुपये तक के नकद चंदा देने वाले का नाम, पता या पैन कार्ड की घोषणा करने की अनिर्वायता नहीं है। ऐसे में आरोप लगता है कि अक्सर छोटे-छोटे दल काले धन को सफेद करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार ये राजनीतिक दल 10, 20 या 50 रुपये के रसीद छपवाकर अपने चुनावी अभियान के लिए बेचते हैं, लेकिन वास्तव में रसीद छवपाकर यह संदेश दिया दिया जाता है कि सारी रसीदें बिक गई। विशेषज्ञ के अनुसार कारोबारी या कोई अन्य व्यक्ति अपना काला धन राजनीतिक दल को नगद सौंप देता है और बाद में पैसा देने वाला व्यापारी अपनी किसी फर्जी कंपनी के नाम पर पार्टी को सेवाएं प्रदान करते हैं। चुनाव अभियान में टेंट, गाड़ी, या बैनर सप्लाई करने का फर्जी बिल थमा देता है। बाद में पार्टी चेक के जरिए भुगतान करती है।
नगद चंदा देने पर रोक की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लंबित
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर राजनीतिक दलों को 2000 रुपये तक के नगद चंदा देने पर रोक लगाने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने 24 नवंबर, 2025 को पारदर्शिता के लिए राजनीतिक दलों को ₹2000 तक के नगद चंदे पर रोक लगाने और रकम चाहे कितनी भी हो, हर राजनीतिक चंदे को इनकम टैक्स के दायरे में लाने की याचिका पर विचार करने पर सहमति जताई।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल इस याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दी थी। याचिका में कहा गया है कि इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 13ए का क्लॉज (डी) राजनीतिक दलों को 2000 रुपये तक के नगद चंदे पर टैक्स छूट देता है। याचिका में कहा गया कि कर में छूट का फायदा उठाकर कुछ छोटे दल काले धन को सफेद करने की गतिविधि में शामिल होते हैं, इसलिए इस पर रोक लगाई जानी चाहिए।
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