
पिता की दौलत-शोहरत, हुकूमत, मान-प्रतिष्ठा सब कुछ हासिल करने वाला बेटा उनके समर्पण, संघर्ष, सिद्धांत और सोच को नहीं समझ पाता है तो सूली पर चढ़ जाता है… खुद को शहंशाह समझने वाला बेटा उद्धव बन जाता है…अपनों की ठोकरें खाता है… खुद को न घर का न घाट का पाता है… चार दिन की चांदनी में जीकर अंधेरे में डूब जाता है, क्योंकि वो पिता की सीख को नहीं अपनाता है… बाला साहेब ठाकरे ने अपना जीवन संघर्षों में खपाया…मौकों को पहचानकर उनको भुनाया… पग-पग चलकर मंजिलों को पाया और जिस बुनियाद पर महल टिकाया, उनकी मौत के बाद उनके बेटे उद्धव ने उसी बुनियाद को हिलाया… सत्ता के लालच में हिंदूवाद की पताका से अपना शिखर फहराने वाले बाला साहेब के किले पर जब मिली-जुली विचारधारा रखने वाले दलों के झंडे लहराने लगे तो विद्रोह का सर उठाना लाजमी था…कभी पद की लालसा नहीं रखने वाले और बहुमत पाकर भी कभी मुख्यमंत्री नहीं बनने वाले बाला साहेब के नाकाबिल बेटे उद्धव ने कुर्सी के लालच में गठबंधन को ठुकराया और खुद को शहंशाह बनाया… पार्टी को अपनी बपौती बनाया और दिग्गजों को अपने दूधमुहे बेटे का बंधुआ बनाया तो मौका ताड़ते ही सभी ने पाला बदलकर हौसला दिखाया…अब उद्धव उन्हें गद्दार कहकर बुलाएं या दोगला कहकर आक्रोश जताएं, लेकिन अपने गिरेबां में झांककर यदि हकीकत को समझ पाएं तो न सिर्फ खुद सीख पाएं, बल्कि जमाने को भी सबक सिखाएं कि जो पिता की सीख को नहीं अपनाता है, वो भीख के लायक भी नहीं रह जाता है… जमाने की ठोकरें खाता है… अर्श से फर्श पर आ जाता है… खुद तो फकीर हो जाता है, पिता का नाम भी डुबाता है… इससे बुरी हालत उद्धव की क्या होगी कि पिता की विरासत तो लुट रही है, उनका नाम भी उसे ठुकराने वालों ने चुरा लिया… बाला साहेब के नाम पर बागियों ने अपना गुट बना लिया, क्योंकि उन्होंने बाला साहेब के सिद्धांतों को अपना लिया…हिंदूवाद और हिंदूवादी भाजपा से हाथ मिलाकर खुद को असली हकदार बना लिया… शिवसेना का नाम और तीर-कमान दोनों उद्धव ने गंवा दिया… विधायकोंं और सांसदों के जाने का गम मनाने और असली लुटी हुई दौलत को नहीं पहचानने वाले उद्धव ठाकरे अभी और भी ठोकरें खाएंगे… जब तक वो हकीकत समझ पाएंगे… तब तक राजनीति की दुनिया से रुखसत होते नजर आएंगे…
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