
नई दिल्ली । विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) रथ यात्रा (Rath Yatra) केवल रथ खींचने तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसका समापन भी एक अत्यंत विशेष धार्मिक परंपरा के साथ होता है। इस अंतिम अनुष्ठान को नीलाद्रि बीजे (Niladri Bije) कहा जाता है, जो भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की मुख्य मंदिर में पुनः वापसी का प्रतीक माना जाता है। इसी अवसर पर माता लक्ष्मी (Goddess Lakshmi) और भगवान जगन्नाथ से जुड़ी एक लोकप्रिय पौराणिक कथा (Mythological Story) का मंचन भी किया जाता है, जिसने इस परंपरा को विशेष पहचान दिलाई है।
रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नौ दिनों के लिए गुंडिचा मंदिर जाते हैं, जिसे उनकी मौसी का घर माना जाता है। नौ दिन पूरे होने के बाद तीनों देवता भव्य शोभायात्रा के साथ श्रीमंदिर लौटते हैं। भगवान के इस पुनः प्रवेश को ही नीलाद्रि बीजे कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी अनुष्ठान के साथ वार्षिक रथ यात्रा का समापन माना जाता है।
‘नीलाद्रि’ शब्द भगवान जगन्नाथ के मुख्य धाम स्थित उस पवित्र पर्वत का प्रतीक है, जबकि ‘बीजे’ का अर्थ पुनः प्रवेश या अपने स्थान पर विराजमान होना होता है। इस दिन विशेष वैदिक मंत्रों और धार्मिक विधि-विधानों के साथ भगवान के विग्रहों को रथों से उतारकर मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचाया जाता है, जहां वे पुनः अपने रत्न सिंहासन पर विराजमान होते हैं।
नीलाद्रि बीजे की सबसे चर्चित परंपरा माता लक्ष्मी और भगवान जगन्नाथ के बीच प्रेमपूर्ण संवाद से जुड़ी है। मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा पर निकले तो वे अपने साथ भाई और बहन को तो ले गए, लेकिन माता लक्ष्मी को साथ नहीं ले गए। इस बात से माता लक्ष्मी नाराज हो गईं। जब भगवान नौ दिन बाद लौटे तो उन्होंने मंदिर के द्वार बंद कर दिए और भगवान को तुरंत प्रवेश नहीं करने दिया।
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान जगन्नाथ ने माता लक्ष्मी का क्रोध शांत करने के लिए उन्हें रसगुल्ले का भोग अर्पित किया। भगवान के इस स्नेहपूर्ण प्रयास और मिठाई के प्रतीकात्मक उपहार से माता लक्ष्मी प्रसन्न हो गईं और मंदिर के द्वार खोल दिए। तभी से नीलाद्रि बीजे के अवसर पर भगवान जगन्नाथ को रसगुल्ले का भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है। यह रस्म पति-पत्नी के स्नेह, सम्मान और आपसी समझ का भी प्रतीक मानी जाती है।
इस अवसर पर पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और भगवान के पुनः प्रवेश के साक्षी बनते हैं। मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार, विशेष पूजा-अर्चना और पारंपरिक अनुष्ठानों के बीच भगवान के विग्रहों को गर्भगृह में स्थापित किया जाता है। कई स्थानों पर माता लक्ष्मी और भगवान जगन्नाथ के इस प्रसंग का सांस्कृतिक और धार्मिक रूप में भी मंचन किया जाता है।
नीलाद्रि बीजे केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा में पारिवारिक संबंधों, प्रेम, क्षमा और पुनर्मिलन का भी सुंदर संदेश देता है। यही कारण है कि रथ यात्रा के अंतिम दिन मनाया जाने वाला यह पर्व श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था और उत्साह का केंद्र बना रहता है। भगवान जगन्नाथ की यह अनोखी परंपरा हर वर्ष लाखों भक्तों को अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने का कार्य करती है।
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