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पाकिस्तान में मिला प्लास्टिक तोड़ने वाला फंगस, 2 महीने में पॉलीयुरेथेन फिल्म पर दिखा असर; वैज्ञानिकों को नई उम्मीद

August 10, 2026

इस्लामाबाद। प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution) से जूझ रही दुनिया के बीच पाकिस्तान (Pakistan) से सामने आई एक वैज्ञानिक खोज ने कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा की हैं। इस्लामाबाद के एक नगरपालिका कचरा निपटान स्थल की मिट्टी से अलग किए गए एस्परगिलस ट्यूबिंगेंसिस नामक फंगस में ऐसे प्लास्टिक को तोड़ने की क्षमता पाई गई, जिसे सामान्य परिस्थितियों में विघटित करना बेहद मुश्किल माना जाता है।

यह फंगस खास तौर पर पॉलिएस्टर पॉलीयुरेथेन (PU) पर असर डालने में सक्षम पाया गया। पॉलीयुरेथेन का इस्तेमाल सिंथेटिक लेदर, कोटिंग्स, कुशन, इन्सुलेशन और कई औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है। इसकी टिकाऊ संरचना के कारण इसका कचरा लंबे समय तक पर्यावरण में बना रह सकता है।


  • 2017 में सामने आई थी यह वैज्ञानिक खोज

    इस खोज से जुड़ा अध्ययन वर्ष 2017 में जर्नल Environmental Pollution में प्रकाशित हुआ था। अध्ययन का विषय था—Biodegradation of polyester polyurethane by Aspergillus tubingensis। शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में कल्चर और मिट्टी में दफनाने जैसे प्रयोगों के जरिए फंगस की पॉलीयुरेथेन को नुकसान पहुंचाने की क्षमता का परीक्षण किया।

    शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह एस्परगिलस ट्यूबिंगेंसिस द्वारा पॉलीयुरेथेन को खराब करने की क्षमता का पहला रिपोर्टेड मामला था।

    फंगस प्लास्टिक को कैसे तोड़ता है?

    शोध में पाया गया कि फंगस पॉलीयुरेथेन की सतह पर चिपककर वहां बढ़ने लगता है। इसके बाद वह प्लास्टिक की सतह को नुकसान पहुंचाता है। वैज्ञानिकों ने स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (SEM) के जरिए प्लास्टिक की सतह की जांच की तो उस पर दरारें, कटाव, छेद और गहरे निशान दिखाई दिए।

    इससे संकेत मिला कि फंगस केवल प्लास्टिक की सतह पर मौजूद नहीं था, बल्कि उसकी संरचना पर सक्रिय रूप से असर डाल रहा था।

    रासायनिक स्तर पर भी बदलाव दर्ज किए गए। ATR-FTIR स्पेक्ट्रोस्कोपी से पता चला कि पॉलीयुरेथेन के रासायनिक बॉन्ड में परिवर्तन हो रहा था। यानी फंगस के प्रभाव से प्लास्टिक की आणविक संरचना कमजोर हो रही थी।

    एंजाइमों ने निभाई अहम भूमिका

    शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने एस्टरेज और लाइपेज जैसे एंजाइमों की सक्रियता भी दर्ज की। ये एंजाइम पॉलीमर की संरचना में मौजूद कुछ रासायनिक घटकों को तोड़ने में भूमिका निभा सकते हैं।

    सबसे उल्लेखनीय परिणाम लिक्विड-कल्चर प्रयोग में सामने आया। इसमें पॉलीयुरेथेन की एक फिल्म को फंगस के साथ तरल माध्यम में रखा गया। करीब दो महीने बाद फिल्म छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर गई और नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में काफी हद तक खराब हो गई।

    यह परिणाम इस बात का संकेत था कि फंगस पॉलीयुरेथेन की संरचना पर जैविक तरीके से हमला कर सकता है।

    लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्लास्टिक दो महीने में गायब हो जाएगा

    इस खोज को लेकर सबसे जरूरी बात यह है कि इसे प्लास्टिक कचरे का तत्काल समाधान नहीं माना जा सकता। प्रयोग नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में किए गए थे। इसलिए इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि पर्यावरण में पड़ा कोई पॉलीयुरेथेन का गद्दा, जूता या अन्य उत्पाद सिर्फ दो महीने में पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

    प्लास्टिक का छोटे टुकड़ों में टूटना और उसका पूरी तरह सुरक्षित पदार्थों में बदल जाना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से यह साबित करने के लिए कि प्लास्टिक का कार्बन पूरी तरह हानिरहित अंतिम उत्पादों में बदल गया, पूर्ण खनिजीकरण (मिनरलाइजेशन) जैसे पहलुओं की भी पुष्टि जरूरी है।

    क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?

    पॉलीयुरेथेन की सबसे बड़ी समस्या उसकी टिकाऊ प्रकृति है। इसका इस्तेमाल रोजमर्रा के सामान से लेकर औद्योगिक उत्पादों तक में होता है और सामान्य तापमान व नमी की परिस्थितियों में यह आसानी से विघटित नहीं होता।

    ऐसे में कोई प्राकृतिक जीव यदि इसकी रासायनिक संरचना पर हमला करने में सक्षम हो, तो यह भविष्य की जैविक कचरा-प्रसंस्करण तकनीकों के लिए महत्वपूर्ण सुराग दे सकता है।

    फंगस से ज्यादा अहम हो सकते हैं उसके एंजाइम

    भविष्य में वैज्ञानिक इस दिशा में यह पता लगा सकते हैं कि एस्परगिलस ट्यूबिंगेंसिस द्वारा बनाए जाने वाले एंजाइम किस तरह पॉलीयुरेथेन के रासायनिक बंधों को तोड़ते हैं। अगर इन एंजाइमों की प्रक्रिया को नियंत्रित और बड़े पैमाने पर दोहराना संभव हुआ, तो सीधे फंगस के बजाय उसके एंजाइमों का इस्तेमाल भी प्लास्टिक उपचार की तकनीक विकसित करने में किया जा सकता है।

    हालांकि इसके लिए अभी कई सवालों के जवाब तलाशने बाकी हैं—क्या यह प्रक्रिया अलग-अलग तरह के पॉलीयुरेथेन पर समान रूप से काम करेगी, इसकी गति कितनी बढ़ाई जा सकती है और क्या प्रयोगशाला के बाहर भी इसे सुरक्षित एवं आर्थिक रूप से इस्तेमाल किया जा सकता है।

    फिलहाल एस्परगिलस ट्यूबिंगेंसिस को प्लास्टिक खत्म करने वाला कोई ‘जादुई फंगस’ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि इसने एक बेहद कठिन प्लास्टिक की संरचना को जैविक तरीके से नुकसान पहुंचाने की क्षमता दिखाई है। प्लास्टिक प्रदूषण के बढ़ते संकट के बीच यह खोज भविष्य की बायोडिग्रेडेशन तकनीकों के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सुराग जरूर बन सकती है।

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