इस्लामाबाद। पाकिस्तान (Pakistan) इस समय राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संकट के कई मोर्चों पर घिरा हुआ है। बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) के बढ़ते प्रभाव के दावे, खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के लगातार हमले और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जारी विरोध प्रदर्शनों ने शहबाज शरीफ सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे माहौल में एक बार फिर पाकिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप और संभावित तख्तापलट की अटकलें तेज हो गई हैं।
इन चर्चाओं के केंद्र में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का नाम लिया जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या सेना मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को किनारे कर सीधे सत्ता अपने हाथ में लेने की तैयारी कर रही है? हालांकि, तख्तापलट को लेकर किए जा रहे दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
बलूचिस्तान में BLA और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष लंबे समय से जारी है। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि BLA ने कई इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ाया है और पाकिस्तानी सेना तथा पुलिस को निशाना बनाया है।
विद्रोही संगठन ड्रोन और आधुनिक हथियारों के जरिए सैन्य ठिकानों के अलावा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से जुड़े प्रोजेक्ट्स को भी निशाना बनाने की कोशिश कर रहा है। इससे पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ चीन की अरबों डॉलर की परियोजनाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी सरकार के खिलाफ असंतोष लगातार चर्चा में है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में प्रदर्शनकारी महंगाई, बिजली, संसाधनों और शासन से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध कर रहे हैं।
रावलकोट समेत कई इलाकों में आंदोलन ने इस्लामाबाद के लिए चुनौती खड़ी की है। प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच टकराव ने इस सवाल को और मजबूत किया है कि क्या केंद्र सरकार अपने नियंत्रण वाले इस संवेदनशील क्षेत्र में स्थिति को संभाल पाने की स्थिति में है।
खैबर पख्तूनख्वा में TTP भी पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। पुलिस थानों, सैन्य ठिकानों और सुरक्षा काफिलों पर हमलों की घटनाएं सामने आती रही हैं।
अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के साथ पाकिस्तान के रिश्ते भी तनावपूर्ण हैं। सीमा पर जारी विवाद और TTP के खिलाफ कार्रवाई को लेकर दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप पाकिस्तान की सुरक्षा चुनौतियों को और जटिल बना रहे हैं।
पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में सेना का दखल कोई नई बात नहीं है। अयूब खान, जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ के दौर में सेना सीधे सत्ता पर काबिज हो चुकी है। यही वजह है कि मौजूदा संकट के बीच आसिम मुनीर की भूमिका को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं।
पाकिस्तान के पूर्व सैन्य अधिकारी आदिल रजा ने भी दावा किया है कि ISI मुख्यालय में कई घंटे तक चली बैठक में देश की मौजूदा व्यवस्था पर चर्चा हुई और कथित तौर पर नए सिस्टम को लेकर सहमति बनी। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
विश्लेषकों के मुताबिक, यदि पाकिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप की स्थिति बनती है तो शुरुआत में राष्ट्रीय आपातकाल या सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर सेना को अतिरिक्त अधिकार दिए जा सकते हैं। इसके बाद राजनीतिक संस्थाओं की भूमिका सीमित हो सकती है।
चरम स्थिति में सेना संविधान को निलंबित कर सीधे शासन अपने हाथ में ले सकती है और मार्शल लॉ लागू किया जा सकता है। हालांकि, यह फिलहाल एक संभावित परिदृश्य है और ऐसा होने के कोई पुष्ट संकेत सामने नहीं आए हैं।
पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता का असर भारत की सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। यदि वहां सैन्य शासन स्थापित होता है और घरेलू संकट गहराता है, तो नई सत्ता अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए भारत विरोधी बयानबाजी या सीमा पर तनाव बढ़ाने की कोशिश कर सकती है।
ऐसे किसी भी घटनाक्रम में भारत के लिए सीमा सुरक्षा और पश्चिमी मोर्चे पर सैन्य तैयारियां अहम हो जाएंगी। हालांकि, फिलहाल आसिम मुनीर द्वारा तख्तापलट की कोई आधिकारिक घोषणा या इसकी पुष्टि करने वाला विश्वसनीय सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए पाकिस्तान में सैन्य सत्ता परिवर्तन की चर्चा को अभी अटकलों और अपुष्ट दावों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
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