
नई दिल्ली । मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी (Mallikarjun Khadge and Rahul Gandhi) ने कहा कि जाति जनगणना की मौजूदा प्रश्नावली (Current questionnaire for caste census) रद्द कर नए सिरे से बनाई जाए (Should be Scrapped and Redrafted from Scratch) ।
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को संयुक्त पत्र लिखकर जाति जनगणना की मौजूदा प्रक्रिया पर गंभीर चिंता जताई है। इसके साथ ही मौजूदा प्रश्नावली रद्द करने और जातियों की प्रमाणित सूची के आधार पर नई प्रश्नावली बनाने की मांग की है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर पोस्ट में कहा, “ओपन-एंडेड (खुला-समाप्त) सवालों के जरिए जातियों की सही गिनती संभव नहीं है। एक ही जाति अलग-अलग नामों और उपजातियों में दर्ज हुई तो आंकड़े बिखरेंगे और सबसे बड़ा नुकसान ओबीसी, अति पिछड़े और वंचित समुदायों को होगा। हमारी मांग स्पष्ट है कि मौजूदा प्रश्नावली रद्द हो, जातियों की प्रमाणित सूची के आधार पर नई प्रश्नावली बने और राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों व जनता से व्यापक परामर्श किया जाए। तेलंगाना और बिहार के जाति सर्वेक्षणों की तरह, पहले से तैयार और प्रमाणित जाति सूची के आधार पर गणना इसका व्यावहारिक समाधान है। जाति जनगणना सिर्फ होनी नहीं चाहिए, सही भी होनी चाहिए।”
प्रधानमंत्री को संबोधित पत्र में राहुल गांधी और खड़गे ने लिखा, “भारत में सामाजिक न्याय की नीतियां सही आंकड़ों के बिना पूरी नहीं हो सकतीं। अलग-अलग जातियों की संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सही आकलन तभी संभव है, जब जातियों की गिनती सही तरीके से हो। आपकी सरकार ने जनगणना में जाति की जानकारी दर्ज करने के लिए खुला-समाप्त प्रश्न का तरीका चुना है, जो भ्रामक है। इसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति का जो नाम बताएगा, वही नाम दर्ज कर लिया जाएगा।”
कांग्रेस नेताओं ने पत्र में लिखा, “भारत में एक ही जाति अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों, उपजातियों और भाषाओं से जानी जाती है। ऐसे में यदि एक ही जाति के लोग जनगणना में अलग-अलग नामों से दर्ज होंगे, तो एक जाति हजारों नामों में बंट जाएगी। देश में लाखों जातियों के नाम निकलेंगे और जाति जनगणना से हासिल पूरा आंकड़ा ही अनुपयोगी हो जाएगा। जब किसी समुदाय की सही संख्या ही दर्ज नहीं होगी, तो उसकी स्थिति का आकलन भी गलत होगा। इसका नुकसान पिछड़े, अति पिछड़े और अन्य वंचित समुदायों को होगा। साथ ही शिक्षा, रोजगार, योजनाओं व सामाजिक न्याय से जुड़े फैसले भी प्रभावित होंगे। इससे यह भी पता नहीं चलेगा कि भारत में ओबीसी की आबादी कितनी है क्योंकि इस जनगणना में “पिछड़ा वर्ग” शब्द तक शामिल नहीं है।”
उन्होंने लिखा, “इसका आसान समाधान पहले से मौजूद है। जातियों की एक ड्रॉप-डाउन सूची बनाई जाए। अनुसूचित जाति और जनजाति की गणना में यही तरीका अपनाया जाता है। यह सूची मौजूदा सरकारी सूचियों जैसे सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग सूची और भारतीय मानवशास्त्र सर्वेक्षण के आधार पर आसानी से बनाई जा सकती है। तेलंगाना और बिहार के जाति सर्वेक्षणों में भी यही तरीका अपनाया गया था। संदर्भ के लिए दोनों सर्वेक्षणों की जाति सूचियां पत्र के साथ संलग्न हैं। इस तरीके से की जा रही जाति जनगणना को हम स्वीकार नहीं करते। सरकार मौजूदा प्रश्नावली रद्द कर राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और जनता से बातचीत कर नई प्रश्नावली तैयार करे ताकि हर जाति और समुदाय की सही संख्या सामने आए और जाति जनगणना सटीक, सार्थक और लाभकारी हो।”
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