कॉक्स बाजार। म्यांमार के रखाइन राज्य में सुरक्षित वापसी की मांग को लेकर बांग्लादेश (Bangladesh) के कॉक्स बाजार स्थित शरणार्थी शिविरों (Refugee camps) में हजारों रोहिंग्या मंगलवार को सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रखाइन में ऐसा सुरक्षित और शांतिपूर्ण माहौल बनाने की अपील की, जिससे वे अपने घर लौट सकें। रोहिंग्याओं ने इस दिन को ‘रोहिंग्या नरसंहार की नौवीं वर्षगांठ’ के रूप में मनाया।
रैली के दौरान शरणार्थियों ने अपनी मातृभूमि लौटने की इच्छा जताई और कहा कि वे अनिश्चितकाल तक बांग्लादेश के शिविरों में नहीं रहना चाहते।
रोहिंग्या शरणार्थी नेता सैयद उल्लाह ने सभा को संबोधित करते हुए रखाइन के पुराने नाम ‘अराकान’ का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि जब तक अराकान आर्मी और म्यांमार की सेना के बीच मौजूदा संघर्ष और राजनीतिक टकराव जारी रहेगा, तब तक रखाइन में सुरक्षा सुनिश्चित करना मुश्किल होगा।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मौजूदा परिस्थितियों में रोहिंग्याओं को अगले 50 साल तक बांग्लादेश में ही रहना होगा। उनका कहना था कि वे इतने लंबे समय तक यहां नहीं रह सकते और रखाइन में शांति के अनुकूल माहौल बनाने के रास्ते तलाशने होंगे।
बांग्लादेश के कॉक्स बाजार क्षेत्र के अलग-अलग शिविरों में 10 लाख से अधिक रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है, जो 2017 में म्यांमार की सैन्य कार्रवाई के बाद रखाइन छोड़कर बांग्लादेश पहुंचे थे।
2017 में एक रोहिंग्या मुस्लिम विद्रोही समूह के हमले के बाद म्यांमार की सेना ने बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया था। इसके बाद हिंसा, हत्याओं और अन्य अत्याचारों के बीच लाखों रोहिंग्या पैदल और नावों के जरिए बांग्लादेश पहुंचे। बांग्लादेश ने अपनी सीमा खोलकर सात लाख से अधिक लोगों को शरण दी थी। इससे पहले की हिंसा के कारण तीन लाख से अधिक रोहिंग्या पहले से ही बांग्लादेश में रह रहे थे।
बांग्लादेश सरकार कम से कम दो बार रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश कर चुकी है। हालांकि, सुरक्षा स्थिति को लेकर आशंकित शरणार्थियों ने लौटने से इनकार कर दिया। इस वजह से दोनों प्रयास सफल नहीं हो सके।
बांग्लादेश ने साफ किया है कि किसी भी रोहिंग्या को उसकी इच्छा के खिलाफ म्यांमार वापस नहीं भेजा जाएगा।
इस महीने की शुरुआत में म्यांमार की सैन्य समर्थित सरकार ने कहा था कि बांग्लादेश के शिविरों में रह रहे तीन लाख से अधिक रोहिंग्या रखाइन के पूर्व निवासी हैं। म्यांमार ने दावा किया कि सुरक्षा स्थिति बेहतर होने पर इन्हें वापस स्वीकार किया जा सकता है।
हालांकि, इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। बांग्लादेश म्यांमार द्वारा रोहिंग्याओं के लिए ‘बंगाली’ शब्द के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताता रहा है। ढाका का कहना है कि इस तरह उन्हें संबोधित करना उनकी पहचान को नकारने की कोशिश है।
रोहिंग्या संकट को लेकर जनवरी में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में म्यांमार के खिलाफ चल रहे मामले की सुनवाई हुई। अदालत ने 2017 की सैन्य कार्रवाई के दौरान कथित सामूहिक हत्याओं, यौन हिंसा और गांवों के विनाश से जुड़े दस्तावेजों, विशेषज्ञों की गवाही और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों की समीक्षा की।
संयुक्त राष्ट्र समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने 2017 के अभियान के पैमाने और हिंसा को लेकर जातीय सफाए तथा नरसंहार के आरोप लगाए हैं। हालांकि, म्यांमार ने अदालत के समक्ष इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसकी सैन्य कार्रवाई रोहिंग्या विद्रोहियों के खिलाफ वैध आतंकवाद विरोधी अभियान थी।
2017 के बाद से रोहिंग्याओं की वापसी का सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा को लेकर रहा है। हाल के वर्षों में रखाइन की स्थिति और ज्यादा अस्थिर हुई है। म्यांमार की सेना और विद्रोही अराकान आर्मी के बीच संघर्ष तेज होने के बाद अराकान आर्मी ने राज्य के बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है।
ऐसे में मंगलवार की रैली के जरिए रोहिंग्या शरणार्थियों ने एक बार फिर साफ संदेश दिया कि वे बांग्लादेश के शिविरों में स्थायी रूप से नहीं रहना चाहते, बल्कि सुरक्षित परिस्थितियां बनने पर अपने घर रखाइन लौटना चाहते हैं।
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