
नई दिल्ली। नेपाल (Nepal) में भोटेकोशी नदी (Bhotekoshi River) की विनाशकारी बाढ़ के बाद अब नेपाल-चीन सीमा (Nepal-China border) के पास बनी एक प्राकृतिक झील (Natural lake) ने चिंता बढ़ा दी है। छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो नदियों के संगम पर बनी इस बैरियर लेक में तेजी से पानी जमा हो रहा है। वैज्ञानिकों और चीनी अधिकारियों को आशंका है कि झील का प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ने या टूटने पर अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आ सकता है। चीन ने अगले 72 घंटे को बेहद अहम मानते हुए रियल-टाइम मॉनिटरिंग और फ्लड सिमुलेशन शुरू किया है।
भारत से कितनी दूर है झील?
यह इलाका भारत की सीमा से सीधे सटा हुआ नहीं है। मौजूदा आकलन के अनुसार, झील और दोनों नदियों का संगम भारत की सीमा से करीब 120 से 140 किलोमीटर उत्तर में है। वहीं, यह नेपाल-चीन सीमा के रसुवागढ़ी-ग्यिरोंग बॉर्डर क्रॉसिंग से करीब 18 किलोमीटर ऊपर बताया जा रहा है।
भौगोलिक दूरी से ज्यादा चिंता इसके नदी तंत्र को लेकर है। यहां से निकलने वाला पानी नेपाल के नदी तंत्र में आगे बढ़ता है और अंततः गंडक नदी के रास्ते बिहार में प्रवेश करता है। यही वजह है कि भारत में भी इस घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है।
झील में करीब 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी जमा
चीनी अधिकारियों की चेतावनी के मुताबिक, बैरियर लेक में पानी का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। हाइड्रोजियोलॉजिस्ट के आकलन के अनुसार, इसमें करीब 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी जमा हो चुका है। इसके अलावा प्राकृतिक बांध के पीछे करीब 30 लाख क्यूबिक मीटर अतिरिक्त पानी जमा होने की आशंका है।
यदि पानी का दबाव बढ़ने से प्राकृतिक बांध टूटता है तो स्थिति ग्लेशियल या भूस्खलन से बनी झील के अचानक फटने यानी GLOF/लेक आउटबर्स्ट फ्लड जैसी हो सकती है। ऐसे में पानी सामान्य बाढ़ की तरह धीरे-धीरे नहीं बढ़ता, बल्कि तेज रफ्तार से नीचे आता है और अपने साथ चट्टान, मिट्टी, पेड़ और मलबा भी बहा सकता है।
72 घंटे क्यों हैं सबसे अहम?
चीन ने अगले 72 घंटे के लिए रियल-टाइम निगरानी और फ्लड सिमुलेशन शुरू किया है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि प्राकृतिक बांध में दरार बढ़ने या उसके टूटने की स्थिति में पानी किस दिशा में और कितनी तेजी से आगे बढ़ सकता है। चीन के जल संसाधन और वैज्ञानिक मंत्रालय ने 27 अगस्त को करीब 3.30 बजे इस संबंध में चेतावनी जारी की थी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि झील का पानी धीरे-धीरे ओवरफ्लो होगा या प्राकृतिक बांध अचानक टूट जाएगा। दोनों परिस्थितियों में खतरे का स्तर अलग होगा। पानी नियंत्रित तरीके से निकलता है तो डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों को तैयारी के लिए अधिक समय मिल सकता है, लेकिन बांध अचानक टूटने पर कम समय में बड़ी बाढ़ की लहर नीचे की ओर बढ़ सकती है।
भारत तक कैसे पहुंच सकता है पानी?
इस खतरे को समझने के लिए नदी तंत्र को देखना जरूरी है। छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो से निकलने वाला पानी आगे नेपाल के नदी तंत्र में शामिल होता है। भोटेकोशी से जुड़ा पानी आगे त्रिशूली नदी की दिशा में बढ़ता है। त्रिशूली आगे चलकर नारायणी यानी गंडक नदी तंत्र का हिस्सा बनती है। यही नदी नेपाल से निकलकर भारत में प्रवेश करती है।
इसलिए सीमा के पास बनी झील सीधे भारत में नहीं है, लेकिन इसके पानी का संबंध उस नदी तंत्र से है जो आगे बिहार और उत्तर प्रदेश तक पहुंचता है। ऊपरी क्षेत्र में अचानक पानी बढ़ने की स्थिति में डाउनस्ट्रीम इलाकों में भी सतर्कता जरूरी हो जाती है।
नेपाल में पहले ही हो चुकी है भारी तबाही
यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब नेपाल में भोटेकोशी नदी की बाढ़ पहले ही भारी नुकसान कर चुकी है। रसुवा, नुवाकोट और धादिंग समेत कई इलाकों में घर, सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त हुए हैं। तेज बहाव के साथ आए मलबे ने कई बस्तियों को प्रभावित किया है और बड़ी संख्या में लोग लापता बताए गए हैं।
बाढ़ के बाद से नेपाल के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों और नदी के बहाव पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। अब चीन की नई चेतावनी के बाद इस निगरानी का महत्व और बढ़ गया है।
अभी भारत में बड़ी बाढ़ की आशंका तय नहीं
अगले 72 घंटे में तीन चीजों पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी—झील का जलस्तर कितना बढ़ता है, प्राकृतिक बांध कितना स्थिर रहता है और पानी बाहर निकलने पर उसकी मात्रा व रफ्तार कितनी होती है।
फिलहाल इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में निश्चित रूप से बड़ी बाढ़ आने वाली है। लेकिन नेपाल में हाल की तबाही और झील के गंडक नदी तंत्र से जुड़े होने के कारण बिहार और उत्तर प्रदेश के नदी किनारे वाले इलाकों में सतर्कता जरूरी है। अगले 72 घंटे यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं कि झील स्थिर रहती है या उसका पानी अचानक नीचे की ओर निकलता है।
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