
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। अगर संघर्ष लंबा खिंचता है और दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होती है, तो महंगा क्रूड और कमजोर रुपया भारत में महंगाई का दबाव बढ़ा सकते हैं। एमके वेल्थ मैनेजमेंट की एक रिपोर्ट ने इसको लेकर चिंता जताई है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है। एमके की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम एशिया के संघर्ष से तेल की सप्लाई लंबे समय तक बाधित हुई तो इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। महंगे ईंधन से परिवहन लागत बढ़ सकती है। इसका असर सामान की ढुलाई और उत्पादन लागत पर पड़ने के कारण रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगे कच्चे तेल के साथ अगर भारतीय रुपया भी कमजोर होता है, तो स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। डॉलर में खरीदे जाने वाले कच्चे तेल के लिए भारतीय कंपनियों को ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे। इससे घरेलू अर्थव्यवस्था पर महंगाई का ज्यादा दबाव बन सकता है। एमके वेल्थ मैनेजमेंट के हेड ऑफ रिसर्च डॉ. जोसेफ थॉमस ने कहा कि भारत के लिए जोखिम केवल कच्चे तेल की ऊंची कीमतों तक सीमित नहीं है। कमजोर रुपया इस दबाव को और बढ़ा सकता है।
रिपोर्ट में होरमुज जलडमरूमध्य को सबसे अहम जोखिमों में बताया गया है। दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल प्रवाह के लिए यह रास्ता महत्वपूर्ण है। इसके अलावा लाल सागर और बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य में किसी तरह का व्यवधान वैश्विक तेल सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा सकता है।
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड करीब 75 डॉलर से बढ़कर 98 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया था। बाद में कूटनीतिक बातचीत की उम्मीद बढ़ने पर कीमतों में नरमी आई। रिपोर्ट के समय शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड करीब 88.29 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
अगर संघर्ष जल्दी खत्म होता है और सप्लाई रूट सामान्य हो जाते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन लंबे समय तक सप्लाई बाधित रहने पर महंगाई और आर्थिक विकास दोनों पर असर पड़ने की आशंका है।
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