वॉशिंगटन। अंग प्रत्यारोपण (Organ transplantation) की दुनिया में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसे भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेरिका में एक मरीज सुअर की जीन-एडिटेड किडनी (Gene-edited kidney) के सहारे करीब नौ महीने यानी 271 दिनों तक बिना डायलिसिस के जीवित रहा। इसके बाद डॉक्टरों ने सफलतापूर्वक उसके शरीर से सुअर की किडनी निकालकर इंसानी किडनी ट्रांसप्लांट कर दी।
यह मामला इसलिए खास है क्योंकि पहली बार किसी जीवित मरीज में जानवर के अंग ने इंसानी अंग मिलने तक एक अस्थायी ‘ब्रिज’ के तौर पर काम किया। इस सफलता की रिपोर्ट मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित हुई है।
इस ऐतिहासिक प्रक्रिया से गुजरने वाले मरीज का नाम टिम एंड्रयूज है। अमेरिका के रहने वाले एंड्रयूज जब जेनोट्रांसप्लांटेशन यानी जानवर से इंसान में अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया से गुजरे, तब उनकी उम्र 66 वर्ष थी। वह किडनी की आखिरी स्टेज की बीमारी से जूझ रहे थे और इंसानी डोनर किडनी के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे थे।
मरीज को FDA के ‘Expanded Access Investigational New Drug’ कार्यक्रम के तहत एक जेनेटिकली मॉडिफाइड युकाटन मिनिएचर पिग की किडनी ट्रांसप्लांट की गई।
इस किडनी को इंसानी शरीर के लिए ज्यादा अनुकूल बनाने के लिए सुअर के जीन में 69 बदलाव किए गए थे। इन बदलावों का मकसद मुख्य रूप से इंसानी इम्यून सिस्टम द्वारा किडनी को रिजेक्ट किए जाने और संक्रमण के जोखिम को कम करना था।
ट्रांसप्लांट के बाद किडनी ने तुरंत काम करना शुरू कर दिया। एंड्रयूज को करीब 271 दिनों तक डायलिसिस की जरूरत नहीं पड़ी। इस दौरान उन्होंने सामान्य जिंदगी की कई गतिविधियां फिर से शुरू कर दीं। वह खाना बनाने, टहलने और घर के काम करने में सक्षम रहे।
करीब छह महीने बाद सुअर की किडनी की कार्यक्षमता कम होने लगी। इसके साथ ही एंड्रयूज को सूजन जैसी समस्याएं भी होने लगीं। करीब नौ महीने बाद डॉक्टरों ने सुअर की किडनी निकालने का फैसला किया।
इसके बाद कुछ समय तक एंड्रयूज को फिर डायलिसिस की जरूरत पड़ी। फिर जनवरी 2026 में उन्हें एक मृत डोनर से इंसानी किडनी मिली और उसका सफल ट्रांसप्लांट किया गया।
खास बात यह रही कि इंसानी किडनी ने तुरंत काम करना शुरू कर दिया। बाद की जांच में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि पहले सुअर की किडनी लगाए जाने के कारण एंड्रयूज का शरीर इंसानी किडनी के प्रति असामान्य रूप से संवेदनशील हो गया था।
डॉक्टरों के मुताबिक, जांच में सुअर से जुड़े किसी पैथोजन के ट्रांसमिशन का सबूत नहीं मिला। वहीं ब्लड टेस्ट में यह भी सामने आया कि सुअर की किडनी ने ऐसे एंटीबॉडी नहीं बनाए, जो बाद में इंसानी अंग के ट्रांसप्लांट में परेशानी पैदा कर सकते थे।
यानी जेनोट्रांसप्लांट के बाद एंड्रयूज को इंसानी किडनी मिलने में कोई ऐसी बड़ी इम्यून समस्या सामने नहीं आई, जो पहले लगाए गए जानवर के अंग से जुड़ी हो।
सुअर की किडनी के सहारे किसी जीवित इंसान का बिना डायलिसिस 271 दिनों तक जीवित रहना इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में जेनोट्रांसप्लांटेशन उन मरीजों के लिए ‘ब्रिज’ का काम कर सकता है, जिन्हें इंसानी डोनर अंग मिलने में लंबा समय लग जाता है।
किडनी की आखिरी स्टेज की बीमारी से जूझ रहे मरीजों में कई लोग लंबे समय तक डायलिसिस पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में अगर जानवर के अंग को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से कुछ समय के लिए इस्तेमाल किया जा सके, तो मरीज को इंसानी डोनर मिलने तक अतिरिक्त समय मिल सकता है।
जानवरों के अंगों को इंसानों में लगाने की कोशिश नई नहीं है। दशकों से वैज्ञानिक जेनोट्रांसप्लांटेशन पर शोध कर रहे हैं और सुअर के दिल, लिवर और किडनी जैसे अंगों पर विशेष ध्यान दिया गया है।
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सुअर के कई अंगों का आकार और कुछ शारीरिक कार्य इंसानों के अंगों से काफी मिलते-जुलते हैं। हालांकि जानवर के अंग को इंसानी शरीर में सफलतापूर्वक काम कराने के लिए इम्यून रिजेक्शन और संक्रमण जैसी बड़ी चुनौतियों से निपटना पड़ता है।
दुनिया में इंसानी डोनर अंगों की भारी कमी है। किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले मरीजों को कई बार लंबे समय तक डोनर का इंतजार करना पड़ता है और इस दौरान उन्हें नियमित डायलिसिस पर निर्भर रहना पड़ता है।
टिम एंड्रयूज का मामला इस बात का शुरुआती सबूत देता है कि जीन-एडिटेड सुअर की किडनी भविष्य में इंसानी किडनी मिलने तक जीवन बचाने वाली अस्थायी व्यवस्था बन सकती है।
हालांकि वैज्ञानिक अभी इसे व्यापक इलाज का विकल्प नहीं मानते। इम्यून कंट्रोल, संक्रमण की सुरक्षा और लंबे समय तक अंग के काम करने जैसे सवालों पर और शोध तथा क्लिनिकल ट्रायल जरूरी हैं। फिर भी 271 दिनों की यह उपलब्धि जेनोट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
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