जयपुर। राजस्थान (Rajsthan) के करौली स्थित प्रसिद्ध अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी जैन मंदिर (Shri Mahavir Ji Jain Temple) के प्रबंधन और अधिकार को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर (Shvetambara and Digambara) संप्रदायों के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने दोनों पक्षों के बीच जारी मुकदमेबाजी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए भगवान महावीर के शांति और अहिंसा के संदेश का भी उल्लेख किया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दोनों पक्षों को 1991 के पूजा स्थल अधिनियम (Places of Worship Act) से जुड़े अपने-अपने लिखित जवाब आठ दिनों के भीतर दाखिल करने का निर्देश दिया है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने दोनों पक्षों से विवाद को आपसी समझ और धार्मिक संवेदनशीलता के साथ देखने की अपील की। उन्होंने सवाल किया कि जिस महान संत और भगवान महावीर ने दुनिया को शांति का संदेश दिया, उनके नाम पर इस तरह की लगातार मुकदमेबाजी से क्या हासिल होगा।
पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि क्या दोनों संप्रदायों के बीच इस तरह विवाद जारी रहना उचित है कि एक पक्ष सुबह अपनी परंपरा के अनुसार पूजा करे और दूसरा पक्ष शाम को अलग तरीके से अनुष्ठान करे। अदालत ने धार्मिक भावनाओं की संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों पक्षों को मुकदमेबाजी समाप्त करने की दिशा में विचार करने की नसीहत दी।
मामले में मुख्य कानूनी बहस पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की लागू होने की स्थिति को लेकर हुई। दिगंबर पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलील दी कि मौजूदा विवाद किसी पूजा स्थल के स्वरूप में बदलाव या रूपांतरण से संबंधित नहीं है, बल्कि मंदिर के प्रबंधन और अधिकारों से जुड़ा है। इसलिए इस मामले में 1991 का कानून लागू नहीं होना चाहिए और विवाद का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
वहीं, श्वेतांबर पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम ने अदालत के समक्ष अलग रुख रखा। उन्होंने कहा कि निचली अदालत ने 1991 के अधिनियम के आधार पर कार्यवाही समाप्त कर दी थी। उनके अनुसार, इस कानून में अपील का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं होने के कारण हाईकोर्ट को संबंधित अपील स्वीकार नहीं करनी चाहिए थी।
श्वेतांबर पक्ष की ओर से यह भी दलील दी गई कि मंदिर, भगवान महावीर की प्रतिमा और उससे संबंधित संपत्तियों पर ऐतिहासिक रूप से दिगंबर संप्रदाय का नियंत्रण रहा है। दूसरी ओर, दिगंबर पक्ष मंदिर के प्रबंधन से जुड़े अपने अधिकारों को लेकर अदालत के समक्ष अपनी दलीलें रख रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की मौखिक दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। पीठ ने श्वेतांबर और दिगंबर दोनों पक्षों को आठ दिनों के भीतर अपनी लिखित दलीलें और पूजा स्थल अधिनियम, 1991 से जुड़े जवाब दाखिल करने को कहा है।
अब मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार है। वर्षों पुराने इस विवाद में अदालत की ओर से की गई कड़ी और भावनात्मक टिप्पणी के बाद दोनों संप्रदायों के बीच विवाद के समाधान को लेकर भी उम्मीदें बढ़ी हैं।
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