
नई दिल्ली। भारत(India) में सोने की कीमतें(Gold prices) लंबे समय से ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। इसके बावजूद बाजार में कुछ खरीदारों को सोने की खरीद पर हजारों रुपये तक की छूट मिलने की बात सामने आ रही है। खासतौर पर बिना बिल और नकद भुगतान (Cash payment)वाली खरीदारी में यह अंतर दिखाई दे रहा है। बाजार से जुड़े लोगों के मुताबिक कुछ मामलों में थोक खरीदारों को मौजूदा बाजार कीमत के मुकाबले करीब 6 प्रतिशत तक की छूट मिल सकती है। इसका सीधा संबंध टैक्स और अनौपचारिक कारोबार से जोड़ा जा रहा है।
सोने और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ने के साथ इनकी आधिकारिक खरीदारी की लागत भी बढ़ी है। इसके अलावा खुदरा ग्राहकों को सोने की खरीद पर 3 प्रतिशत जीएसटी भी देना पड़ता है। ऐसे में जब ग्राहक को नकद भुगतान और बिना रसीद के सौदे में बाजार भाव से कम कीमत की पेशकश होती है तो कई लोग इसे तत्काल बचत के तौर पर देखते हैं। हालांकि ऐसी खरीदारी में ग्राहक के पास आधिकारिक बिल नहीं होता और लेनदेन का रिकॉर्ड भी औपचारिक व्यवस्था में दर्ज नहीं होता।
एक खरीदार ने बताया कि बेटी की शादी के लिए गहने खरीदते समय उन्हें 10 ग्राम सोने पर करीब 5000 रुपये की छूट मिली। उन्होंने बिल नहीं लिया और ज्वेलर पर भरोसे के कारण सौदा कर लिया। सोने की ऊंची कीमतों के बीच कुछ हजार रुपये की बचत भी खरीदारों के लिए बड़ी रकम बन जाती है। यही वजह है कि महंगे सोने के बावजूद नकद और बिना बिल वाले सौदों की ओर कुछ ग्राहकों का रुझान बढ़ने की बात कही जा रही है।
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक ऊंचे आयात शुल्क का असर केवल आधिकारिक बाजार तक सीमित नहीं रहता। जब टैक्स वाली खरीदारी और अनौपचारिक बाजार की कीमतों के बीच बड़ा अंतर बनता है तो कुछ कारोबारी टैक्स बचाकर उस अंतर का हिस्सा ग्राहक को छूट के रूप में दे सकते हैं। इसी वजह से आधिकारिक और समानांतर बाजार में सोने की कीमतों में अंतर देखने को मिल रहा है।
भारत में सोने की मांग का बड़ा हिस्सा शादी विवाह त्योहार और पारिवारिक बचत से जुड़ा हुआ है। देश में सोने का घरेलू उत्पादन सीमित है इसलिए मांग का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। सोने का आयात बढ़ने से देश के व्यापार संतुलन और विदेशी मुद्रा पर भी असर पड़ता है। इसी कारण सरकार लंबे समय से सोने के आयात और खपत को नियंत्रित करने के उपाय करती रही है।
बाजार में मौजूद जानकारी के अनुसार आधिकारिक चैनल से आने वाले सोने की कीमत में भी कुछ समय पर छूट देखने को मिलती है। वहीं रिटेल स्तर पर ग्राहक और ज्वेलर के बीच बातचीत के आधार पर अलग-अलग डिस्काउंट मिल सकते हैं। लेकिन बिना बिल होने वाली बड़ी छूट को केवल सामान्य ज्वेलरी डिस्काउंट समझना सही नहीं होगा। इसमें टैक्स और लेनदेन के औपचारिक रिकॉर्ड से जुड़े सवाल भी शामिल होते हैं।
आने वाले शादी और त्योहार के सीजन में सोने की मांग बढ़ने की उम्मीद रहती है। ऐसे समय में कीमत और टैक्स के बीच अंतर ग्राहकों के खरीदारी के फैसले को प्रभावित कर सकता है। सस्ता सौदा आकर्षक जरूर लग सकता है लेकिन बिना बिल की खरीदारी में ग्राहक को आधिकारिक खरीद प्रमाण नहीं मिलता। इसलिए सोना खरीदते समय कीमत के साथ बिल टैक्स और शुद्धता से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी लेना भी महत्वपूर्ण है।
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