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‘भारत के मिलिट्री एक्सपोर्ट में सबसे आगे ब्रह्मोस’, पूरी तरह स्वदेशी बनाने की तैयारी, जाने क्‍या बोले CEO जयतीर्थ?

October 23, 2026

नई दिल्ली। भारत (India) की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस (BrahMos supersonic cruise missile) को पूरी तरह स्वदेशी बनाने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस (BrahMos Aerospace) के एमडी और सीईओ डॉ. जयतीर्थ आर. जोशी (CEO Dr. Jayateerth R. Joshi) के मुताबिक, ब्रह्मोस भारत के सैन्य निर्यात में अग्रणी भूमिका निभा रही है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस मिसाइल के इस्तेमाल के बाद इसकी क्षमता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा को लेकर चर्चा बढ़ी है। अब कंपनी मिसाइल के हल्के और नए संस्करण विकसित करने के साथ उत्पादन क्षमता तथा सप्लाई चेन को मजबूत करने पर भी काम कर रही है।

ब्रह्मोस को भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना में शामिल किया जा चुका है। इसकी रेंज, सटीकता और मारक क्षमता इसे भारत के प्रमुख रक्षा हथियारों में शामिल करती है। कंपनी अब ब्रह्मोस-एनजी यानी नेक्स्ट जेनरेशन मिसाइल के विकास पर भी काम कर रही है, जिससे भारत की एयर-लॉन्च्ड स्ट्राइक क्षमता को बढ़ाने का लक्ष्य है।

डिफेंस एक्सपोर्ट में ब्रह्मोस की अहम भूमिका
भारत का रक्षा निर्यात 62.7 प्रतिशत की सालाना वृद्धि के साथ 38,400 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस वृद्धि में ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है।

डॉ. जोशी ने कहा कि ब्रह्मोस के निर्यात की सफलता की शुरुआत 2025 में इसके कॉम्बैट टेस्ट से पहले ही हो गई थी। वर्ष 2022 में कंपनी को पहला बड़ा निर्यात ऑर्डर मिला था। उनके मुताबिक, इस मल्टी-मिलियन डॉलर के समझौते ने वैश्विक बाजार में भारत के रक्षा निर्यात की संभावनाओं को मजबूत किया।

उन्होंने बताया कि फिलीपींस के साथ पहली निर्यात डील के बाद इस साल दक्षिण-पूर्व एशिया के दो अन्य देशों के साथ भी समझौते किए गए हैं। फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम को ऑर्डर और डिलीवरी के साथ ब्रह्मोस का निर्यात 600 मिलियन डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है।


  • सप्लाई चेन मजबूत करने की तैयारी
    ब्रह्मोस की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कंपनी अपनी उत्पादन व्यवस्था और सप्लाई चेन का विस्तार कर रही है। डॉ. जोशी के अनुसार, हैदराबाद, नागपुर, पिलानी और लखनऊ स्थित उत्पादन इकाइयां तेजी से काम कर रही हैं।

    कंपनी प्रत्येक सिस्टम और सब-सिस्टम के लिए औद्योगिक भागीदारों की संख्या बढ़ाने की तैयारी में है। अभी जहां एक-दो इंडस्ट्री पार्टनर्स पर निर्भरता है, वहां इसे बढ़ाकर 45 सोर्स विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे उत्पादन में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ गुणवत्ता और लागत को बेहतर बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    ब्रह्मोस-एनजी का प्रोटोटाइप 2027-28 तक तैयार होने की उम्मीद
    ब्रह्मोस के भविष्य के विकास में ब्रह्मोस-एनजी को अहम माना जा रहा है। यह मौजूदा मिसाइल का छोटा और हल्का संस्करण होगा, जिसे कम जगह में तैनात करने और एयरक्राफ्ट से इस्तेमाल करने के लिहाज से विकसित किया जा रहा है। इसे भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस के एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया के सहयोग से विकसित किया जा रहा है।

    डॉ. जोशी ने उम्मीद जताई कि 2027 या 2028 तक इसका पहला प्रोटोटाइप तैयार हो जाएगा। उन्होंने कहा कि नए सिस्टम में स्वदेशी तकनीक और उन्नत सामग्रियों का अधिक इस्तेमाल होगा। इसके लिए बड़े पैमाने पर अनुसंधान एवं विकास की जरूरत होगी।

    1,500 किलोमीटर रेंज वाले संस्करण पर भी काम
    ब्रह्मोस एयरोस्पेस 1,500 किलोमीटर की रेंज वाले स्ट्राइक संस्करण पर भी काम कर रहा है। कंपनी के मुताबिक, मिसाइल की जमीन, समुद्र और हवा से टेस्ट फायरिंग की जा चुकी है और इसकी शुरुआती 290 किलोमीटर की रेंज सीमा से आगे की क्षमता पर भी काम हुआ है। हालांकि, 1,500 किलोमीटर की रेंज वाला संस्करण अभी अवधारणा के स्तर पर है।

    नौसेना के लिए फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर का कॉन्ट्रैक्ट
    रक्षा मंत्रालय ने 6 अक्टूबर को भारतीय नौसेना के जहाजों के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर खरीदने के लिए ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ अनुबंध किया। इस परियोजना में कम से कम 68 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) समेत विभिन्न भारतीय उद्योगों की भागीदारी भी होगी।

    डॉ. जोशी के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर के बाद ब्रह्मोस ने उच्च तीव्रता वाले और कई मोर्चों पर लड़े जाने वाले आधुनिक युद्ध में अपनी उपयोगिता प्रदर्शित की है। कंपनी अब स्वदेशीकरण, निर्यात, उत्पादन विस्तार और नई पीढ़ी की मिसाइलों के विकास के जरिए इसकी क्षमताओं को आगे बढ़ाने पर काम कर रही है।

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