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MP में सरकारी खरीदी में बड़ा खेल… ₹306 की LED ₹11,800 और ₹5 का फिनाइल ₹33,500 में खरीदी

October 23, 2026

भोपाल। मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के नगरीय निकायों (Urban Bodies) में सरकारी खरीद (Government Procurement) के आंकड़ों ने हर किसी को चौंका दिया. कहीं एक लीटर फिनॉलिक डिसइन्फेक्टेंट (Phenolic disinfectant) यानी फिनाइल की कीमत ₹5 दर्ज हुई, तो कहीं इसी तरह के उत्पाद के लिए ₹33,500 खर्च किए गए. 60 वॉट की LED लाइट कहीं ₹306 में खरीदी गई, जबकि भोपाल में इसी क्षमता की लाइट की कीमत ₹11,800 दर्ज हुई. कचरा गाड़ियों की खरीद में भी दो लाख और छह लाख रुपये तक का अंतर सामने आया है. इन आंकड़ों के बाद सवाल उठ रहे हैं कि सरकारी पैसे से सामान खरीदते समय कीमतों की तुलना और निगरानी कितनी गंभीरता से की गई।

नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. इसमें वह नगरीय निकायों की खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए अधिकारियों को चेतावनी देते दिखाई दे रहे हैं. बैठक में MPSEDC के एडिशनल एमडी अंशुमान राज की ओर से प्रस्तुत विश्लेषण के आधार पर खरीद की दरों में सामने आए बड़े अंतर की जानकारी दी गई. अधिकारियों को साफ संदेश दिया गया कि अब असामान्य कीमतों और खरीद में गड़बड़ी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।


  • तीन साल में ₹1,134 करोड़ की खरीद, ₹250 करोड़ बचने का अनुमान
    बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने पिछले तीन साल में सरकारी ई-मार्केटप्लेस यानी GeM पोर्टल के जरिए करीब ₹1,134 करोड़ की खरीदारी की. इस खरीद का विश्लेषण करते हुए अनुमान लगाया गया कि यदि सामान औसत दरों पर खरीदा जाता, तो करीब ₹250 करोड़ की बचत हो सकती थी.

    यह आंकड़ा सरकारी खरीद की प्रक्रिया, कीमतों के आकलन और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है. जब एक ही तरह के सामान की खरीद अलग-अलग निकायों में बहुत अलग कीमतों पर होती है, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि इसके पीछे वजह क्या है. क्या सामान की गुणवत्ता अलग थी, क्या तकनीकी विशेषताओं में अंतर था या खरीद की शर्तें अलग थीं.

    हालांकि, औसत दरों पर खरीद से संभावित बचत का अनुमान अपने आप में भ्रष्टाचार का अंतिम प्रमाण नहीं है. इसके लिए संबंधित उत्पादों की विशिष्टताओं, गुणवत्ता, मात्रा, सप्लाई, इंस्टॉलेशन और भुगतान के रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी. फिर भी सामने आए आंकड़े यह सवाल जरूर उठाते हैं कि सरकारी खरीद में कीमतों की तुलना करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी रही.

    प्रेजेंटेशन में फिनॉलिक डिसइन्फेक्टेंट की खरीद का उदाहरण खास तौर पर सामने आया. आंकड़ों के मुताबिक, एक नगरीय निकाय में एक लीटर उत्पाद की कीमत ₹5 दर्ज हुई, जबकि दूसरी जगह इसी तरह के उत्पाद के लिए ₹33,500 की कीमत सामने आई.

    एक ही श्रेणी के उत्पाद की कीमत में इतना बड़ा अंतर चौंकाने वाला है. आम तौर पर खरीद के दौरान सामान की गुणवत्ता, मात्रा, ब्रांड, तकनीकी मानक और बाजार दरों को ध्यान में रखा जाता है. ऐसे में यह जांचना जरूरी है कि दोनों जगह खरीदे गए उत्पाद वास्तव में समान थे या नहीं. यदि उनकी विशेषताएं अलग थीं, तो उस अंतर का रिकॉर्ड में स्पष्ट होना भी जरूरी है.

    इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कीमतों का निर्धारण किस आधार पर किया गया. क्या खरीद से पहले अलग-अलग दरों की तुलना हुई थी. क्या संबंधित अधिकारियों ने उत्पाद की वास्तविक कीमत और उसकी उपयोगिता का आकलन किया था. इन सवालों का जवाब खरीद दस्तावेजों और तकनीकी विवरणों की जांच के बाद ही सामने आ सकता है.

    ₹306 की LED लाइट भोपाल में ₹11,800 की
    LED लाइट की खरीद में भी कीमतों का बड़ा अंतर सामने आया. प्रेजेंटेशन के मुताबिक, 60 वॉट की LED लाइट एक जगह ₹306 में खरीदी गई, जबकि भोपाल में इसी क्षमता की लाइट की कीमत ₹11,800 दर्ज हुई. भोपाल में इस खरीद का कुल मूल्य ₹3.78 लाख बताया गया.

    एक ही क्षमता की लाइट के लिए इतनी अलग कीमत दर्ज होने से खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है. हालांकि, सिर्फ वॉट के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि दोनों लाइट पूरी तरह एक जैसी थीं. उनकी गुणवत्ता, तकनीकी मानक, अतिरिक्त उपकरण, इंस्टॉलेशन और अन्य शर्तों की जानकारी भी जरूरी है.

    लेकिन यदि दोनों उत्पादों की विशेषताएं और खरीद की शर्तें समान थीं, तो कीमतों में इतना बड़ा अंतर गंभीर जांच का विषय बनता है. सरकारी खरीद में केवल सामान मंगाना ही पर्याप्त नहीं है. यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि भुगतान उचित दर पर हो और सरकारी पैसे का सही इस्तेमाल किया जाए.

    दो लाख की कचरा गाड़ी दूसरी जगह छह लाख में
    बैठक में संजय दुबे ने कचरा गाड़ियों की खरीद का उदाहरण भी दिया. उनके मुताबिक, एक नगरीय निकाय ने एक कचरा गाड़ी दो लाख रुपये में खरीदी, जबकि दूसरे निकाय ने चार डस्टबिन के साथ उसी तरह की गाड़ी के लिए छह लाख रुपये खर्च किए.

    इस उदाहरण में भी कीमतों के अंतर को लेकर सवाल उठे. क्या दोनों गाड़ियों का आकार, निर्माण, गुणवत्ता और उपयोग एक जैसा था. क्या छह लाख रुपये की खरीद में अतिरिक्त सुविधाएं या दूसरे खर्च शामिल थे. इन बातों की जांच से ही वास्तविक अंतर का पता चल सकता है.

    संजय दुबे ने खरीद में अतिरिक्त सामान जोड़कर कीमत बढ़ाए जाने और अपने लोगों के जरिए खरीद कराए जाने की आशंका भी जताई. यह टिप्पणी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर चिंता सामने रखती है. यदि किसी खरीद में अनुचित तरीके से कीमत बढ़ाई गई है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए दस्तावेजों और भुगतान के रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी.

    डंपर, स्ट्रीट लाइट और डिसइन्फेक्टेंट पर भी करोड़ों खर्च
    प्रेजेंटेशन में पिछले तीन साल के दौरान अलग-अलग मदों में हुए खर्च का ब्योरा भी दिया गया. इसमें गारबेज टिपर और डंपर की खरीद पर करीब ₹65 करोड़, स्ट्रीट लाइट पर ₹49 करोड़, ऑक्टागोनल पोल पर ₹27 करोड़ और डिसइन्फेक्टेंट पर करीब ₹18 करोड़ खर्च होने की जानकारी सामने आई.

    ये सभी सामान नगरीय निकायों के रोजमर्रा के कामकाज से जुड़े हैं. कचरा उठाने वाली गाड़ियों से लेकर सड़कों की रोशनी और सफाई में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों तक, इनकी खरीद पर बड़ी रकम खर्च की जाती है. इसलिए इनकी दरों की तुलना, गुणवत्ता की जांच और भुगतान की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है.

    यदि सामान उचित दरों पर खरीदा जाता है, तो सरकारी पैसे की बचत हो सकती है. इसके उलट, यदि समान उत्पाद के लिए बिना उचित वजह ज्यादा भुगतान किया जाता है, तो सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है. ऐसे में खरीद के आंकड़ों का नियमित विश्लेषण और अलग-अलग निकायों की दरों की तुलना जरूरी मानी जाती है.

    संजय दुबे की चेतावनी, अब खरीद में गड़बड़ी पर कार्रवाई
    नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने बैठक में अधिकारियों को साफ संदेश दिया कि विभाग के पास इस बात की जानकारी है कि कौन-सा नगरीय निकाय कौन-सा सामान किस कीमत पर खरीद रहा है. उन्होंने कहा कि पिछले साल इन मामलों में ढील दी गई थी, लेकिन अब खरीद में गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई की जाएगी.

    उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसी गलतियां अब बर्दाश्त नहीं की जाएंगी. इस संदेश से साफ है कि विभाग अब खरीद प्रक्रिया में सामने आने वाले असामान्य अंतर को गंभीरता से लेने की बात कर रहा है.

    अब अहम सवाल यह है कि इन दरों के पीछे वास्तविक कारण क्या थे और क्या संबंधित खरीद में नियमों का पालन किया गया था. यदि उत्पादों की गुणवत्ता और खरीद की शर्तें समान थीं, तो कीमतों के अंतर की जवाबदेही तय करना जरूरी होगा. वहीं, यदि अंतर के पीछे तकनीकी या अन्य वैध कारण थे, तो उनका स्पष्ट रिकॉर्ड भी सामने आना चाहिए.

    374 नगरीय निकायों में तीन साल के दौरान ₹1,134 करोड़ की खरीद और करीब ₹250 करोड़ की संभावित बचत का अनुमान सरकारी खरीद व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत को रेखांकित करता है. अब विभाग की चेतावनी के बाद निगाह इस बात पर रहेगी कि खरीद की दरों की जांच कैसे होती है और गड़बड़ी मिलने पर क्या कार्रवाई की जाती है.

    मंत्री प्रतिमा बागरी बोलीं- गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं
    इस मामले पर नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी ने कहा कि संजय दुबे का जो वीडियो वायरल हुआ है, उसकी पुष्टि कराई जाएगी और मामले की जांच भी की जाएगी. जांच में अनियमितता पाए जाने पर संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने कहा कि पूर्व में भी नगर पालिकाओं और नगर परिषदों में अनियमितताएं सामने आने पर कार्रवाई की गई है. इस मामले में भी कार्रवाई की जाएगी. मंत्री ने कहा कि जरूरत पड़ने पर पहले की गई कार्रवाइयों की सूची भी जारी की जा सकती है.

    कांग्रेस के आरोपों पर पलटवार करते हुए प्रतिमा बागरी ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में भ्रष्टाचार होता था, लेकिन उसकी जांच नहीं की जाती थी. उन्होंने कहा कि यह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा रही है. नगरीय प्रशासन विभाग में भी यदि कोई अनियमितता सामने आती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

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