
जयपुर। एंटी-करप्शन ब्यूरो ने शुक्रवार को वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल के खिलाफ एक प्रारंभिक जांच दर्ज की। उन पर आरोप है कि उन्होंने एक निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया, जिससे राज्य सरकार को वित्तीय नुकसान हुआ। राज्य सरकार ने आज दिन में अग्रवाल के खिलाफ जांच को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी। बुधवार को जब उन्हें अवेइटिंग पोस्टिंग ऑर्डर्स की स्थिति में रखा गया, तब वे उद्योग विभाग में अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत थे।
इस जांच के केंद्र में अग्रवाल और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा विला खरीदने में कथित अनियमितताएं हैं। ब्यूरो ने एक बयान में आरोप लगाया कि अग्रवाल ने अनंता ब्रांड नाम से होटल और रिसॉर्ट चलाने वाली कंपनी गोयल फैशन्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशकों के साथ मिलीभगत की, ताकि कंपनी को अनुचित लाभ दिलाया जा सके। इनमें कथित तौर पर रिसॉर्ट निर्माण से जुड़ी शर्तों में ढील, अनिवार्य प्रमाणपत्रों की जांच किए बिना ही मंजूरी देना और एक विशेष रियायती वित्तीय पैकेज देना शामिल था। ब्यूरो ने बताया कि शुरुआती जांच में यह भी पता चला है कि अग्रवाल ने कंपनी के निदेशकों के साथ मिलीभगत करके उनके अनंता रिसॉर्ट्स में अपने और अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर विला खरीदे।
मार्च 2026 में उन्होंने कथित तौर पर उदयपुर में कंपनी के बुझदा रिसॉर्ट में 20 विला खरीदे। इसके अलावा, उन्होंने अलवर जिले के अजबगढ़ स्थित कंपनी के रिसॉर्ट में भी विला लिए। अजबगढ़ में 16.5 लाख रुपये प्रति विला की दर से आठ विला खरीदे गए। शुरुआती जांच से मिली जानकारी के अनुसार, शिखर अग्रवाल और आईपीएस अधिकारी उनकी पत्नी प्रशाखा माथुर ने उदयपुर के बुझदा रिसॉर्ट में 15-15 लाख रुपये की कीमत पर 10-10 विला खरीदे। अलवर के अजबगढ़ रिसॉर्ट में उनके नाम पर 16.5-16.5 लाख रुपये की कीमत से आठ विला खरीदे गए। उनके दो बेटों ने लगभग 15 लाख रुपये प्रति विला की दर से चार विला खरीदे और अन्य रिश्तेदारों के नाम पर लगभग 16.5 लाख रुपये प्रति विला की दर से चार और विला लिए गए।
ब्यूरो को संदेह है कि परिवार ने ये संपत्तियां बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर हासिल की हैं। ब्यूरो ने दावा किया, “विश्वसनीय सूत्रों से यह भी पता चला है कि अग्रवाल ने इस साल 27 मार्च को 20 विला की खरीद का पंजीकरण कराया। उसी दिन वित्त विभाग ने गोयल फैशन्स प्राइवेट लिमिटेड के लिए एक विशेष रियायती वित्तीय पैकेज जारी किया था।” आरोप है कि सरकार में अपने कार्यकाल के दौरान अग्रवाल ने कंपनी के निदेशकों के साथ मिलीभगत की, जिससे कंपनी को अनुचित लाभ मिला और राज्य को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा।
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