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दुनियाभर में बदल रहा मौसम का मिजाज… WMO की चेतावनी- फरवरी तक रहेगा ‘एल नीनो’ का असर!

October 31, 2026

नई दिल्ली। दुनिया भर (Across World) में इस समय मौसम के बदलते मिजाज (Weather Changing Moods) और रिकॉर्ड तोड़ तापमान को लेकर ‘एल नीनो’ (El Nino) की चर्चा चरम पर है। भीषण गर्मी, अचानक तूफान और मूसलाधार बारिश जैसी असामान्य मौसमी घटनाओं के पीछे इसी प्राकृतिक कारक को जिम्मेदार माना जा रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि एल नीनो का सबसे असरदार रूप अभी आना बाकी है और इसका असर फरवरी 2027 तक जारी रह सकता है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि जब एल नीनो कमजोर पड़ने लगेगा, तो क्या होगा? कई बार प्रशांत महासागर में एक बड़ा उलटफेर होता है- समुद्र का पानी अचानक असामान्य रूप से गर्म होने की बजाय ठंडा होने लगता है, जिससे ‘ला नीना’ (La Nina) का जन्म होता है। यह बदलाव अपने आप नहीं होता, लेकिन जब भी होता है, महाद्वीपों के मौसम का पूरा नक्शा बदलकर रख देता है।


  • क्या हैं एल नीनो और ला नीना?
    अमेरिकी मौसम एजेंसी ‘नोआ’ (NOAA) के अनुसार, एल नीनो और ला नीना एक प्राकृतिक जलवायु पैटर्न के दो विपरीत चरण हैं, जो हर 3 से 7 साल में दोहराए जाते हैं। विज्ञान की भाषा में इस पूरे चक्र को ENSO कहा जाता है। स्पैनिश भाषा में ‘एल नीनो’ का मतलब “छोटा लड़का” होता है, जबकि ‘ला नीना’ का मतलब “छोटी लड़की” होता है।

    हालांकि इन दोनों मौसम चक्रों का जन्म प्रशांत महासागर में होता है, लेकिन इनका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। प्रशांत महासागर के तापमान में होने वाला थोड़ा सा भी बदलाव भारत में मानसून की बारिश, अफ्रीका में सूखा और अमेरिकी महाद्वीपों में भयंकर तूफानों का कारण बनता है। क्योंकि इस बार का एल नीनो पिछले कई दशकों में सबसे शक्तिशाली माना जा रहा है, इसलिए वैज्ञानिक इस बात पर बारीक नज़र बनाए हुए हैं कि आगे क्या होने वाला है।

    दोनों में क्या अंतर है और ये मौसम को कैसे प्रभावित करते हैं?
    एल नीनो (गर्म चरण):
    एल नीनो के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में पूर्व से बहने वाली सामान्य ट्रेड हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती हैं। इसके कारण गर्म समुद्री पानी मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की तरफ फैल जाता है। इसके चलते दुनिया के कई हिस्सों में सूखा और कई जगहों पर बिन मौसम भारी बारिश होती है।

    ला नीना (ठंडा चरण):
    इसके ठीक विपरीत, ला नीना के दौरान व्यापारिक हवाएं सामान्य से कहीं ज्यादा मजबूत हो जाती हैं। ये हवाएं गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ (पश्चिम की ओर) धकेल देती हैं, जिससे दक्षिण अमेरिका के तटों के पास समुद्र की गहराइयों से ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आ जाता है। भारत के लिहाज से ला नीना को आमतौर पर अच्छे मानसून और बेहतर बारिश का संकेत माना जाता है।

    क्या एल नीनो और ला नीना एक के बाद एक आते हैं?
    यह ENSO चक्र का हिस्सा हैं और एक-दूसरे के बाद आते हैं, लेकिन इनका कोई निश्चित या तय शेड्यूल नहीं होता। आमतौर पर एल नीनो की घटनाएं ला नीना के मुकाबले ज्यादा बार देखने को मिलती हैं। हालांकि, जलवायु प्रणाली में कभी-कभी लगातार दो साल तक एक ही चरण (जैसे बैक-टू-बैक ला नीना) भी बना रह सकता है।

    WMO के अनुमान के मुताबिक, 2025 के अंत में उभरा एक कमजोर ला नीना 2026 की शुरुआत में ही खत्म हो गया था। 2026 के मध्य तक स्थितियां पूरी तरह से पलट गईं और एक बेहद आक्रामक एल नीनो ने जन्म ले लिया।

    NOAA के मौसम विज्ञानी नाथनिएल जॉनसन के अक्टूबर 2026 के पूर्वानुमान के अनुसार, वर्तमान में जारी यह शक्तिशाली एल नीनो 2027 की वसंत या शुरुआती गर्मियों तक ढलकर न्यूट्रल थिति में आ सकता है।

    वैज्ञानिकों का कहना है कि एल नीनो के कमजोर होने के बाद ला नीना का आना एक संभावना जरूर है, लेकिन अभी इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती। प्रशांत महासागर में आने वाले महीनों में होने वाले बदलावों पर ही निर्भर करेगा कि अगला चक्र ला नीना का होगा या मौसम सामान्य बना रहेगा।

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