
जबलपुर। आम आदमी संपत्तिकर जमा करने में देरी करे तो नगर निगम नोटिस से लेकर कुर्की की चेतावनी तक देने में देर नहीं करता, लेकिन जब बकायेदार सरकारी विभाग हों तो वसूली का पूरा तंत्र सुस्त पड़ जाता है। जबलपुर में सरकारी विभागों की 132 संपत्तियों पर नगर निगम का करीब 18 करोड़ रुपये सर्विस चार्ज बकाया बताया जा रहा है। कई विभागों पर वर्षों से भुगतान लंबित है, इसके बावजूद वसूली की कार्रवाई नोटिस भेजने तक सीमित नजर आती है।
132 संपत्तियां, लेकिन भुगतान का इंतजार
नगर निगम के राजस्व विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, शहर में 132 ऐसी सरकारी संपत्तियां चिन्हित हैं, जिनसे सर्विस चार्ज मिलना चाहिए, लेकिन भुगतान नहीं हुआ है। इनमें रेलवे, लोक निर्माण विभाग, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, शिक्षा विभाग, पुलिस, जिला अदालत, केंद्रीय उत्पाद शुल्क, आयकर विभाग और डाकघर सहित कई सरकारी कार्यालय शामिल बताए गए हैं। कुछ विभागों का बकाया आठ से दस साल पुराना बताया जा रहा है। नियम के मुताबिक, सरकारी विभागों को अपनी संपत्तियों पर लगने वाले संपत्तिकर के 33.33 प्रतिशत के बराबर वार्षिक सर्विस चार्ज संबंधित नगर निगम को देना होता है। यह राशि शहरी सेवाओं के बदले निर्धारित है। इसके बावजूद भुगतान लंबित रहने से नियमों के पालन और वसूली व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
हर साल नोटिस, फिर भी नहीं खुलता खजाना
नगर निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, विभाग प्रमुखों को हर साल मांग-पत्र भेजे जाते हैं और व्यक्तिगत रूप से भी भुगतान के लिए कहा जाता है। लेकिन कई विभाग बजट में अलग से राशि उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर भुगतान टाल देते हैं। नतीजा यह है कि बकाया घटने के बजाय लगातार बढ़ रहा है। यदि बार-बार नोटिस देने के बाद भी वसूली नहीं हो रही, तो यह निगम की राजस्व व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है। आम करदाताओं से वसूली के लिए सक्रिय रहने वाला निगम सरकारी विभागों के मामले में किस स्तर तक कार्रवाई करता है, इसका जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
18 करोड़ से शहर में हो सकते हैं कई काम
करीब 18 करोड़ रुपये की राशि छोटी नहीं है। इससे शहर में सड़क सुधार, पेयजल व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़े कई कामों को गति मिल सकती है। लेकिन जब सरकारी विभागों से ही समय पर भुगतान नहीं मिलता, तो निगम के संसाधनों पर दबाव बढऩा स्वाभाविक है।
अब सिर्फ नोटिस नहीं, जवाबदेही तय करने की जरूरत
इस बकाये की वसूली के लिए नगर निगम को सभी 132 संपत्तियों का विभागवार ब्योरा, बकाये की अवधि और भेजे गए नोटिसों की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। साथ ही यह स्पष्ट होना चाहिए कि किन विभागों ने कितना भुगतान किया, किसका कितना बकाया है और वसूली में देरी की जिम्मेदारी किसकी है। नगर निगम प्रशासन और जिला प्रशासन के स्तर पर विभाग प्रमुखों की बैठक कर भुगतान की समयसीमा तय करने की जरूरत है। जब आम नागरिक से कर वसूली में सख्ती बरती जाती है, तो सरकारी विभागों के बकाये पर भी समान गंभीरता दिखनी चाहिए। आखिर शहर की सुविधाओं का खर्च निगम उठाए और सरकारी विभागों का भुगतान वर्षों तक अटका रहे—यह व्यवस्था कब तक चलेगी?
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