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सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, दो से ज्यादा बच्चे होने पर सजा के कानूनों पर उठाए सवाल..

November 05, 2026

नई दिल्ली ।भारत (India) में दो से अधिक बच्चे (More Than Two Children) होने पर दंड (Punishment) देने और चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में देश की जनसंख्या (Population) और प्रजनन दर (Fertility Rate) में बड़ा बदलाव आया है। ऐसे में दो से अधिक संतान होने पर लोगों को दंडित करने वाले कानूनों के औचित्य पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता है। अदालत ने कहा कि अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि (Excessive Population Growth) का डर अब पहले जैसी स्थिति में नहीं है।

बुधवार को जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस विषय पर सुनवाई करते हुए कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंड देने वाले कानूनों की प्रासंगिकता समाप्त होती दिखाई दे रही है। पीठ ने वर्ष 2003 में दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले का भी उल्लेख किया। उस समय हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर पंचायत चुनाव लड़ने या पंचायत पद पर बने रहने से अयोग्य ठहराने के प्रावधान को वैध माना गया था।

हालांकि, मौजूदा जनसांख्यिकीय परिस्थितियां पहले से काफी अलग हो चुकी हैं। इसी आधार पर अदालत ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में दिए गए फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत जताई है। इस मामले को अब बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया है, ताकि इस कानूनी व्यवस्था और उसके मौजूदा औचित्य की व्यापक समीक्षा हो सके।

सुनवाई के दौरान पीठ ने प्रजनन संबंधी फैसले लेने के अधिकार को भी महत्वपूर्ण बताया। अदालत के अनुसार, व्यक्ति को यह तय करने की स्वतंत्रता कि उसे कितने बच्चे चाहिए, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अहम हिस्सा है। ऐसे में परिवार के आकार को लेकर बनाए गए दंडात्मक प्रावधानों का मूल्यांकन व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए।

यह टिप्पणी मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। उनका काकोडा ग्राम पंचायत के सरपंच पद पर निर्वाचन इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि उनकी दो से अधिक संतान हैं। इस कारण उन्हें महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(जे-1) के तहत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माना गया था। इसी फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने न्यायालय का रुख किया था।

अदालत ने भारत की कुल प्रजनन दर में आई गिरावट को भी अपने विचार का आधार बनाया। पीठ के अनुसार, वर्ष 2003 के आसपास देश की कुल प्रजनन दर लगभग 3.0 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। सामान्य तौर पर 2.1 की प्रजनन दर को जनसंख्या की प्रतिस्थापन दर माना जाता है। इसका अर्थ है कि लंबे समय में एक पीढ़ी की आबादी को अगली पीढ़ी से बनाए रखने के लिए औसतन कितनी प्रजनन दर आवश्यक होती है।

पीठ ने कहा कि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाए गए पुराने कानूनों की समीक्षा मौजूदा आंकड़ों के आधार पर होनी चाहिए। यदि जनसांख्यिकीय बदलावों को नजरअंदाज किया गया तो भविष्य में गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि प्रजनन दर में लगातार गिरावट के प्रभाव को पलटना आसान नहीं होता।


  • सुप्रीम कोर्ट ने बदलाव के अनुरूप नीतियों और कानूनी दृष्टिकोण को विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया। पीठ ने कहा कि केवल पुराने आधारों पर आगे बढ़ना उचित नहीं है। बदलती परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाना जरूरी है। अब बड़ी पीठ के समक्ष इस मामले की समीक्षा से यह स्पष्ट हो सकेगा कि दो से अधिक बच्चों के आधार पर चुनावी अयोग्यता तय करने वाले प्रावधानों को वर्तमान परिस्थितियों में किस तरह देखा जाना चाहिए।

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