img-fluid

महाभारत समेत भारत के तीन ऐतिहासिक ग्रंथों को UNESCO की वैश्विक मान्यता, जकार्ता में हुआ बड़ा फैसला

November 06, 2026

नई दिल्ली । भारत (India) की प्राचीन सभ्यता, साहित्य और बौद्धिक परंपरा से जुड़ी तीन महत्वपूर्ण कृतियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। महाभारत (Mahabharata), कौटिल्य (Kautilya) के अर्थशास्त्र (Arthashastra) और कश्मीर (Kashmir) के इतिहासकार कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी की पांडुलिपियों को यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर में शामिल किया गया है। यह निर्णय भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

इस फैसले की घोषणा गुरुवार को की गई। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर के 11वें सत्र में तीनों ग्रंथों को सूची में शामिल करने का निर्णय लिया गया। इसके साथ ही इस क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की कुल प्रविष्टियों की संख्या बढ़कर छह हो गई है।

इन तीनों कृतियों का चयन भारतीय इतिहास के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाता है। महाभारत भारतीय साहित्य, दर्शन और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण महाकाव्य है। इसमें केवल कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि धर्म, कर्तव्य, न्याय, सत्ता, मानवीय संबंधों और जीवन से जुड़े जटिल सवालों पर भी विस्तार से विचार किया गया है।

महाभारत में प्रस्तुत विचार और दार्शनिक विमर्श सदियों से भारतीय समाज और संस्कृति को प्रभावित करते रहे हैं। इसकी कथाएं और शिक्षाएं भारत के अलावा दक्षिण एशिया के कई क्षेत्रों की सांस्कृतिक परंपराओं में भी महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। यही वजह है कि इसे केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि व्यापक सभ्यतागत स्मृति का हिस्सा माना जाता है।

इस सूची में शामिल दूसरी महत्वपूर्ण कृति राजतरंगिणी है। इसे 12वीं शताब्दी में कश्मीर के इतिहासकार कल्हण ने लिखा था। इस ग्रंथ में कश्मीर के विभिन्न शासकों, राजनीतिक घटनाओं और उस समय के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। भारतीय इतिहास लेखन में राजतरंगिणी का विशेष महत्व है, क्योंकि इसमें ऐतिहासिक घटनाओं को उपलब्ध साक्ष्यों, परंपराओं और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के आधार पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

तीसरी कृति कौटिल्य का अर्थशास्त्र है, जो प्राचीन भारत की शासन व्यवस्था और प्रशासनिक समझ का विस्तृत दस्तावेज माना जाता है। इसमें राज्य संचालन, आर्थिक नीतियों, कूटनीति, प्रशासनिक व्यवस्था और सामरिक रणनीतियों से जुड़े सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है। यह ग्रंथ बताता है कि प्राचीन भारत में शासन और अर्थव्यवस्था को लेकर किस तरह व्यवस्थित चिंतन विकसित हुआ था।

अर्थशास्त्र का महत्व केवल ऐतिहासिक अध्ययन तक सीमित नहीं है। राजनीति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और कूटनीति के विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए भी इसका अध्ययन किया जाता है। राज्य की जिम्मेदारियों, संसाधनों के प्रबंधन और शासन संचालन से जुड़े इसके विचार आज भी अकादमिक चर्चा का हिस्सा हैं।

तीनों ग्रंथों को इस सूची में शामिल कराने की प्रक्रिया में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संस्थान ने इनके नामांकन से संबंधित दस्तावेज तैयार करने में योगदान दिया। इस उपलब्धि को भारत की ऐतिहासिक स्मृति, धार्मिक चिंतन और शासन परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान के रूप में देखा जा रहा है।


  • यूनेस्को का मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासत के संरक्षण और उसके महत्व को सामने लाने के उद्देश्य से संचालित किया जाता है। महाभारत, राजतरंगिणी और अर्थशास्त्र की पांडुलिपियों को क्षेत्रीय रजिस्टर में स्थान मिलने से भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा के तीन अलग-अलग आयाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज हुए हैं।

    Share:

  • फ्रीगंज पुल पर यातायात जल्द शुरू हो जाएगा..

    Fri Nov 6 , 2026
    उज्जैन। फ्रीगंज ब्रिज पर जल्द ही यातायात शुरू हो जाएगा तथा इससे चामुंडा चौराहे से फ्रीगंज टॉवर तक का यातायात सुगम होगा। उल्लेखनीय है कि नए तथा पुराने शहर को जोडऩे वाले पुराने फ्रीगंज ब्रिज की महापौर बंगले की ओर जाने वाली शाखा का चौड़ीकरण किया जा रहा था। इसके लिए माधव नगर की ओर […]
    सम्बंधित ख़बरें
    लेटेस्ट
    खरी-खरी
    का राशिफल
    जीवनशैली
    मनोरंजन
    अभी-अभी
  • Archives

  • ©2026 Agnibaan , All Rights Reserved