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नई शुरुआत:अब सूरज चुकाएगा कॉलेजों की फीस!

August 31, 2026

  • जबलपुर के 16 शासकीय कॉलेजों में लगेंगे रूफटॉप सोलर प्लांट,चार प्रमुख कॉलेजों में 400 किलोवॉट का सफल उत्पादन

जबलपुर। उच्च शिक्षा विभाग ने जबलपुर जिले के 16 शासकीय कॉलेजों में बिजली खर्च घटाने के लिए रूफटॉप सोलर प्लांट लगाने की व्यापक योजना तैयार की है। वर्तमान में इन शिक्षण संस्थानों पर हर महीने 5 से 6 लाख रुपए का भारी-भरकम बिजली बिल आता है, साथ ही ट्रांसफॉर्मर किराए के रूप में भी प्रति वर्ष लाखों रुपए का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। शासन पर पड़ रहे इसी वित्तीय बोझ को खत्म करने के लिए ऊर्जा विकास निगम के सहयोग से रेस्को मॉडल पर संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। अतिरिक्त संचालक डॉ. अल्केश चतुर्वेदी के अनुसार ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए कॉलेजों को चिन्हित कर जानकारी मांगी गई है। इस पूरी व्यवस्था से शासकीय खर्च में बड़ी बचत सुनिश्चित होगी।


  • रेस्को मॉडल से बिना बड़े निवेश के संयंत्र स्थापना
    ऊर्जा विकास निगम इस परियोजना को चरणबद्ध तरीके से लागू करेगा, जिससे कॉलेजों को संयंत्र लगाने के लिए अपनी ओर से कोई बड़ा बजट नहीं लगाना पड़ेगा। सामान्य दिनों में प्रति कॉलेज बिजली का खर्च 30 से 45 हजार रुपए रहता है, जो गर्मी के मौसम में बढ़कर 50 से 60 हजार रुपए तक पहुंच जाता है। इसके अतिरिक्त 1 से 1.25 लाख रुपए तक ट्रांसफॉर्मर शुल्क भी संस्थानों को चुकाना पड़ता है। रेस्को मॉडल के तहत निजी विकासकर्ता छत पर संयंत्र स्थापित कर सीधे सस्ती बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे।

    चार प्रमुख संस्थानों में 400 किलोवॉट क्षमता पहले चालू
    जिले में अब तक केवल 4 प्रमुख संस्थानों में ही सौर ऊर्जा की सुविधा चालू है, जहां कुल 400 किलोवॉट बिजली का उत्पादन हो रहा है। इनमें शासकीय साइंस कॉलेज, महाकौशल कॉलेज, शासकीय मानकुंवरबाई महिला महाविद्यालय और होम साइंस कॉलेज शामिल हैं। इन सफल मॉडलों की कार्यप्रणाली के बाद अब शेष 16 संस्थानों को भी ग्रिड से जोडऩे की तैयारी की गई है।

    छत के क्षेत्रफल अनुसार 20 से 60 किलोवॉट प्लांट
    प्रत्येक संस्थान की क्षमता तय करने के लिए भवन की कनेक्टेड लोड मांग और छत के कुल क्षेत्रफल का आंकलन किया जाएगा। सामान्य तौर पर 40 किलोवाट क्षमता के सिस्टम के लिए करीब 24 हजार वर्गफीट छत की जरूरत होती है। शुरुआती स्तर पर प्रत्येक कॉलेज में 20 से 60 किलोवॉट तक के सिस्टम लगाए जाएंगे, जबकि बड़े भवनों में आवश्यकता और जगह के अनुसार इससे अधिक क्षमता के संयंत्र भी लगेंगे। छोटे परिसरों में उनकी जरूरत के अनुपात में क्षमता तय होगी।

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