
जबलपुर। जबलपुर के मेडिकल विश्वविद्यालय के विभाजन की प्रक्रिया पूर्ण करते हुए राजभवन के निर्देश पर अतिरिक्त सचिव निरीथ खरे ने अधिकृत राजपत्र में नई व्यवस्था लागू कर दी है। इस राजपत्रित आदेश के तहत जबलपुर स्थित संस्थान का कार्यक्षेत्र घटाकर मात्र 4 संभागों तक सीमित कर दिया गया है, जिससे यह समूचे भारत का सबसे छोटा स्वास्थ्य शिक्षा विश्वविद्यालय बन गया है। इस प्रशासनिक कदम के विरुद्ध नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के प्रमुख डॉ. पीजी नाजपांडे ने मोर्चा खोल दिया है। मंच के प्रतिनिधिमंडल ने पूर्व में राज्यपाल के प्रमुख सचिव डॉ. नवीन कोठारी से व्यक्तिगत मुलाकात कर दोनों हिस्सों के बराबर बंटवारे का प्रस्ताव सौंपा था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके पूर्व अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल से भी दूरभाष पर वार्ता कर जबलपुर का पक्ष रखा गया था।
अधिसूचना को उच्च न्यायालय में देंगे सीधी चुनौती
इस पूरे प्रकरण की विस्तृत जानकारी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और केंद्रीय शासन को औपचारिक पत्राचार के माध्यम से प्रेषित कर दी गई है। जारी गजट नोटिफिकेशन को रद्द कराने के लिए अब सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाने की अंतिम रूपरेखा तैयार हो चुकी है। इस महत्वपूर्ण रणनीतिक विचार-विमर्श के दौरान रजत भार्गव, एडवोकेट वेदप्रकाश अधौलिया, मनीष शर्मा, डॉ. एबी श्रीवास्तव, सुशीला कनौजिया, गीता पांडे और यशवंत कोष्टा उपस्थित रहे।
चार संभागों तक सिमटा मध्य प्रदेश मेडिकल विश्वविद्यालय
नई व्यवस्था प्रभावी होते ही इस उच्च शिक्षण संस्थान का भौगोलिक दायरा बेहद संकुचित हो गया है। पूरे देश में यह पहला ऐसा उदाहरण है जहां किसी राज्य की शीर्ष मेडिकल यूनिवर्सिटी के क्षेत्राधिकार को इस तरह बांटकर कमजोर किया गया हो। इस कटौती से क्षेत्रीय शैक्षणिक संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पडऩे की संभावना जताई जा रही है।प्रशासनिक स्तर पर संस्था का न्यायसंगत वितरण न होने के कारण व्यापक जनआक्रोश पनप रहा है। मंच का स्पष्ट मत है कि यह भेदभावपूर्ण प्रक्रिया देश के संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के मूल अधिकारों का सीधा उल्लंघन करती है। शीर्ष स्तर पर बार-बार तथ्यपरक दस्तावेज प्रस्तुत करने के बावजूद जिम्मेदारों ने कोई भी राहतकारी कदम नहीं उठाया।
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