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अधिक मास 2026: 15 जून तक थमेंगे शुभ कार्य, जानें क्यों देवताओं ने कहा था इसे ‘पुरुषोत्तम मास’

May 21, 2026

 

नई दिल्ली(New Delhi)। सनातन परंपरा(Sanatan tradition) में समय को केवल तारीखों का क्रम नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन(integral component) का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। इसी परंपरा में एक विशेष अवधि होती है जिसे अधिक मास(Adhik Maas) कहा जाता है, जो इस वर्ष 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा। इसे अधिक ज्येष्ठ मास(Adhik Jyeshtha Maas) या पुरुषोत्तम मास(Purushottam Maas) भी कहा जाता है।17 मई से 15 जून 2026 तक अधिक मास रहेगा, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस दौरान विवाह और अन्य शुभ कार्यों(auspicious ceremonies) पर रोक रहती है, जबकि पूजा-पाठ और दान (worship, prayer)को अत्यंत फलदायी माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लगभग 30 दिनों तक चलने वाले इस अतिरिक्त महीने में शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है। विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और नामकरण जैसे संस्कार इस अवधि में नहीं किए जाते। माना जाता है कि इस समय किए गए सांसारिक कार्य अपेक्षित शुभ फल नहीं देते।

अधिक मास का आधार हिंदू पंचांग की खगोल गणना में छिपा है। सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है, जबकि चंद्र वर्ष करीब 354 दिनों का होता है। दोनों के बीच हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर बनता है, जो तीन वर्षों में लगभग 33 दिनों तक पहुंच जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब यह अतिरिक्त महीना अस्तित्व में आया तो किसी भी देवता ने इसे स्वीकार नहीं किया। सभी महीनों के अपने-अपने अधिपति थे, लेकिन इस अतिरिक्त मास का कोई स्वामी नहीं था। दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास पहुंचा, जहां उन्होंने इसे “पुरुषोत्तम मास” का नाम दिया और इसे अपना संरक्षण प्रदान किया। तभी से यह महीना विशेष और अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।


  • धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, यह समय सांसारिक कार्यों की बजाय आत्मिक उन्नति और साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस अवधि में पूजा-पाठ, जप, तप, दान और व्रत को अत्यधिक फलदायी बताया गया है। वहीं व्यापार, निवेश या नए कार्यों की शुरुआत से बचने की सलाह दी जाती है।

    शास्त्रों में वर्णन है कि इस मास में किए गए धार्मिक कार्यों का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है। इसलिए इसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर माना जाता है, जहां भक्ति और आत्मचिंतन को सर्वोच्च महत्व दिया गया है।

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