
वाह अडाणी… यहां भारत में अडाणी पर तोहमतें लगाई जा रही हैं… उनकी दौलत बढ़ाने में सरकार की भागीदारी बताई जा रही है… वहां अडाणी ने अमेरिका की सरकार और कानून दोनों को खरीद लिया… पैसे के बूते और निवेश के दम पर अपने सारे दाग मिटा लिए… उन पर अब रिश्वत का कोई मुकदमा नहीं चलेगा… कोई इनसे सवाल नहीं करेगा… कोई उन्हें अपराधी नहीं कहेगा… जो काम हमारे देश में नहीं हुआ वो अमेरिका जैसे ऊंची नाक वाले देश ने कर दिखाया… क्योंकि वो पैसे की कीमत जानता है… रोजगार को जरूरी मानता है और निवेश के साथ रोजगार देने वाले को प्रश्रय देने का अधिकार मानता है… और हम अपने देश में काम करने वाले की टांग खींचते हैं… सरकारी अधिकारी हो या नेता, उसे मुर्गा समझते हैं… जितना नोंच सको, उतना नोंचने में विश्वास रखते हैं… हमारे देश का कारोबारी भी पैसा देकर काम कराने में समझदारी समझता है… जितना काम, उतना दाम… उतने पर भी ना माने तो तेरा दाम-मेरा काम के सिद्धांत पर चलता है… अडाणी को तो सरकार का सहारा मिल जाता है… इसलिए वो अडाणी बन जाता है… लेकिन आम आदमी को तो नोंचने वाला का कारवां रहता है… नीचे के बाबू से लेकर अफसर और उनसे बड़े अफसर तक से जूझने के बाद नेता और उनके चमचों तक को तोडऩे में लगा रहता है… हमारे नेता हो या अधिकारी… निवेश के लिए दुनियाभर से कारोबारियों को ढूंढते हैं, लेकिन अपने देश के, अपने प्रदेश के और अपने शहर के लोगों में खामियां खोजते रहते हैं… उन्हें नोंचने-खसोटने के नुस्खे आजमाए जाते हैं… इतना दौड़ाया जाता है कि वो हांफते-हांफते निढाल हो जाता है… उसका कसूर यह है कि वो अडाणी नहीं बन पाते है… मोदीजी जैसे लोगों की उंगली नहीं पकड़ पाते है… इसलिए पूरी जिंदगी उठते, गिरते, संभलने में ही खपाते है… जिस दिन यह देश अपनों पर विश्वास करने लग जाएगा… जितनी तिमारदारी विदेशियों की जाती है उतनी हौंसला अफजाई भी यदि देश के लोगों की करने लग जाएगा तो वो भी आगे बढ़ जाएंगे… यदि हम अमेरिका की सोच पर चलते… अडाणी जैसी ऊंंगली सबकी पकड़ते तो इस देश से न विजय माल्या भागते न नीरव-ललित मोदी देश छोडक़र जाते… न वो अपना कर्ज डुबाते और न देश का रोजगार मिटाते…
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