
ब्रिक्स प्रतिनिधिमंडल ने जाना होलकरकालीन रियासत में कैसे कृषि से उन्नत था इंदौर
इंदौर। आज सुबह राजबाड़ा भ्रमण (Visit to Rajwada) में ब्रिक्स सम्मेलन (BRICS Summit) में शामिल होने आए प्रतिनिधिमंडल के करीब 25 सदस्य उस समय भौचक रह गए, जब उन्होंने जाना कि होलकरकालीन रियासत (Holkar-era princely state) में किसानों (Farmers) को मजबूत करने के लिए खाद के साथ ही अन्य किसानी संबंधी मदद देने के लिए अलग से ‘एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट’ हुआ करता था। महाराजा तुकोजीराव तृतीय ने एग्रीकल्चर से जुड़ी रिसर्च के लिए 333 एकड़ जमीन उस वक्त खरीदी थी, जहां आज कृषि महाविद्यालय है। इस जमीन पर इंदौर में प्लांट इंस्टिट्यूट (पौध संस्थान) तैयार किया गया था, जहां अलग-अलग ऑर्गेनिक खाद बनाई जाती थी। यह प्लांट इंस्टिट्यूट की बिल्डिंग आज भी कृषि महाविद्यालय परिसर में मौजूद है।
उस वक्त की आर्गेनिक खाद इंडो पोस्ट देखने के लिए महात्मा गांधी इंदौर आए थे
कृषि पर आधारित ब्रिक्स सम्मेलन में मेहमानों को इंदौर की होलकरकालीन रियासत के वक्त खेती की जागरूकता के बारे में बताया कि कैसे होलकर रियासत में भी कृषि समृद्ध हुआ करती थी। प्लांट इंस्टिट्यूट में तैयार होने वाली अलग-अलग तरह की ऑर्गेनिक खाद में एक खाद ऐसी भी थी, जो दुनियाभर ने अपनाई और 1935 में इस ‘इंडो पोस्ट’ नाम की खाद को देखने के लिए महात्मा गांधी खुद इंदौर आए। ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने आए मेहमानों को यह जानकारी इतिहासकार जफर अंसारी, शर्वाणी, प्रकाश इंदुरकर और संघमित्रा पिपलौदा ने दी। वहीं जफर अंसारी द्वारा म्यूजियम ऑफ इंदौर के निजी संग्रहण से मेहमानों को होलकरकालीन कृषि से जुड़े पत्र, दस्तावेज, नापतौल के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बाट और अन्य माप भी दिखाए गए।
इंदौर की जलवायु थी कपास के लिए बेहतर
होलकरकालीन रियासत की रीढ़ यहां का कपास और यहां की मिलें थीं। यहां की जलवायु कपास को इतना बेहतर बनाती थी कि यह कपड़ा बेहद मुलायम तैयार होता था। ये कपड़ा यूरोप और मिडिल ईस्ट के साथ ही पूरे विश्व में पसंद किया जाता था। यहां 6 मिलें कपड़े तैयार किया करती थीं। रियासत को 18वीं और 19वीं शताब्दी तक कपास और अफीम से सबसे ज्यादा टैक्स मिला करता था। वहीं 19वीं शताब्दी के मध्य से कपास पर ज्यादा जोर दिया गया और अफीम भी कपास की खेती में बदल गई। इस बात का प्रमाण है कि इंदौर के राजकीय चिह्न एवं सिक्कों पर कपास और अफीम के पौधे नजर आया करते थे। यहां की मिलों ने दशकों तक इंदौर को मजबूत किया।
राजबाड़ा की कहानी भी जानी विदेशी मेहमानों ने
तमाम इतिहासकारों ने सभी मेहमानों को राजबाड़ा के बनने के साथ ही उसके जीर्णोद्धार के सफर तक को भी संक्षिप्त में बताया। इसी के साथ इंदौर और इंदौर की संस्कृति की भी जानकारी दी गई। मेहमानों को बताया गया कि राजबाड़ा का निर्माण 1747 में होलकर रियासत के संस्थापक सूबेदार मल्हारराव होलकर ने करवाया था, तब इंदौर को छावनी के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।
चाय-कॉफी की चुस्कियां
राजबाड़ा परिसर में प्रतिनिधिमंडल के सभी सदस्यों के लिए चाय-कॉफी, कोल्ड्रिंक की व्यवस्था की गई। कल दिनभर पुरातत्व विभाग यहां साफ-सफाई में जुटा रहा। वहीं कल देर शाम से लेकर आखिरी समय तक यहां सेटअप और अन्य तैयारी चलती रही।
पहली बार डाइवर्जन से राहत
हर बार किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय स्तर के आयोजन को लेकर जब-जब यहां हेरिटेज वॉक या अन्य कार्यक्रम हुए हैं, तब-तब राजबाड़ा और उसके आसपास ट्रैफिक का डाइवर्जन किया गया। यह पहला मौका था, जब यहां डाइवर्जन नहीं किया गया और आम जनता राजबाड़ा के आसपास आसानी से आवागमन कर सकी। केवल ऑटो और ई-रिक्शा रोके गए।
सिविल में तैनात रहे सुरक्षाकर्मी
प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा के लिए कई पुलिसकर्मियों को सिविल में तैनात किया गया। कल शाम से ही राजबाड़ा की सुरक्षा सुनिश्चित कर दी गई थी। सुरक्षाकर्मियों ने राजबाड़ा की देखरेख करने वाले, वहीं हेरिटेज वॉक के दौरान उपस्थित रहने वाले पुरातत्व विभाग के पांच अधिकारियों के अलावा किसी प्रवेश नहीं दिया।
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